श्री भक्ति प्रकाश भाग 890**बिन समर्पण शांति नहीं
Автор: Bhakti me Shakti
Загружено: 2026-02-27
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Ram bhakti @bhaktimeshakti2281
परम पूज्य डॉक्टर श्री विश्वामित्र जी महाराज जी के मुखारविंद से
((1895))
श्री भक्ति प्रकाश भाग 890
बिन समर्पण शांति नहीं।
इस समय आप, इस पर ध्यानस्थ हो सकते हो । परमेश्वर के वह गुण वर्णन किए हुए हैं, जिनसे आप परिचित नहीं हैं । एक ही गुण पर थोड़ा चिंतन करेंगे, तो ध्यान का विषय बन सकता है, यह पूरे का पूरा भजन । जैसे वंदे रामम सच्चिदानंदम । यह सब भजन स्वामी जी महाराज के इसी प्रकार के हैं, की इन्हें ध्यान का विषय बनाया जा सकता है । ध्यान में जब आप अपने आप को भगवद विचारों में परिपूरित करते हैं, तो परमात्मा के गुण ही तो देखे जाते हैं । उनके गुणों पर ही चिंतन किया जाता है ।
यह ध्यान का विषय होना चाहिए । मात्र राम-राम जपने को ध्यान नहीं कहा जाता । परमेश्वर के गुणों पर चिंतन होना चाहिए, तो राम-राम अपने आप बंद हो जाता है । मन still नहीं होता, शांत नहीं होता, साधक जनों स्थिर नहीं होता, तो ध्यानस्थ नहीं हो सकेगा, ध्यान नहीं हो सकेगा । चंचल मन कभी आपको शांति नहीं दे सकेगा । आप करोड़ों की संख्या में जप कर लीजिएगा ।
इस जप से क्या लाभ लेना है ? अपने चंचल मन को अचंचल बनाना है, भटकते मन को निश्चल बनाना है । यह आप अभ्यास करोगे, ध्यान अभ्यास है । अभ्यास करोगे, तो उस अभ्यास से आपको उपलब्ध होगा । मात्र जाप करते, टीवी देखते, जाप करते, मन और अस्थिर होगा, स्थिर नहीं । जाप तो चल रहा है मशीन की तरह । लेकिन मन भी उसी ढंग से चल रहा है । मन इन सब बातों का बहुत नाजायज फायदा उठाता है, आप की कमजोरियों का । आप टीवी भी देखना चाहो, अक्सर ऐसा होता है, टीवी भी देखते होते हैं, सीरियल भी देखते होते हैं, और हाथ में माला भी चल रही है ।
कोई लाभ नहीं इससे । जाप से यही तो लाभ लेना है, की उस समय का सदुपयोग हो सके, जो टीवी देखने में दुरुपयोग हो रहा है । पर आप टीवी भी देखना चाहते हैं और जाप भी करना चाहते हैं । तो इससे मन और बिगड़ेगा, मन ठीक नहीं होगा । वह कभी शांत नहीं हो पाएगा । और बिना शांति परमात्मा के साथ आपका कभी एकांत नहीं हो पाएगा, मेरे से कोरे कागज पर लिखवा लो ।
जैसा परमात्मा है, वैसा ही आपको बनना पड़ेगा । जैसा निश्चल वह है, स्थिर वह है, शांत वह है, आनंदमय है, वैसा ही आपको अपने आप को बनना होगा । तभी उससे एकांतता आपकी हो सकेगी, तभी उससे एकतारता हो सकेगी, अन्यथा नहीं । परमात्मा के गुणों का चिंतन मन को स्थिर करने में बहुत लाभदायक है । यह वचन वंदे रामम सच्चिदानंदम, कम से कम यह भजन तो ध्यान का विषय, चिंतन का विषय बनाए जा सकते हैं । धन्यवाद ।
बहुत-बहुत धन्यवाद देवियो सज्जनो ।
है तो यह सत्य, इसमें कभी भी संदेह नहीं होना चाहिए, बदकिस्मती है कि हमें विश्वास नहीं होता । संदेह अधिक है, विश्वास कम। लेकिन जो कुछ कहा गया है, फिल्मी गाना है, या जैसे भी है, जो कुछ भी है, जो कुछ कहा गया है, परमेश्वर के लिए;
वह इससे भी सत्य है, अक्षरश: सत्य है । जितना वह प्यार करता है हमसे, अपने बच्चों से, इतना कोई नहीं कर सकता । आपको सांसारिक मां क्या प्यार करेगी उसके मुकाबले में । असंख्य माताओं का प्यार उस मालिक के हृदय में, उस जगजननी के हृदय में । ऐसा विश्वास यदि हो जाए, समझ लेना साधना सफल हो गई, और कुछ करने को शेष नहीं है ।
पुन: अर्ज करूंगा बहुत दुष्कर कार्य है, बहुत कठिन है ।
ऐसा विश्वासी कभी स्वप्न में भी भटकने की नहीं सोच सकता । जिसके सिर पर तू है, उसे कोई और घर देखने की जरूरत नहीं । देखना भी नहीं चाहिए, यह व्यभिचार है। परमात्मा को पसंद नहीं है । दर-दर भटकने वाला, वह कहीं का भी नहीं रहता,
अनेक बार आपकी सेवा में अर्ज कर चुका
हूं । भ्रमर अनेक फूलों पर जाता है । जहां उसे रस मिलता है, अधिक मिलता है, और अधिक मिलता है, कहीं थोड़ा फीका है, कहीं मीठा है, कहीं कैसा है, कहीं कैसा है, जहां से उसे अधिक से अधिक मिलता है, एक फूल से उड़कर दूसरे पर, तीसरे पर यह उसका स्वभाव है । चंपा के फूल पर कभी नहीं जाता ।
एक संत ने बगीचे में खड़े यह दृश्य देखा, और चंपा से पूछा -तुझ में है तीन गुण, बास भी है, सुंदरता भी है । सब कुछ है, पर तेरे पास भ्रमर क्यों नहीं आता ? चंपा का पुष्प बहुत सुंदर उत्तर देता है -महात्मन मुझमें है तीन गुण । सौंदर्य है, सब कुछ है, बास भी है, लेकिन जगह-जगह पर भटकने वाले को कौन बिठाए पास । यह भ्रमर जगह जगह भटकने वाला है । इसलिए मैं इस भ्रमर को अपने पास नहीं आने देता । यह एक सामान्य पुष्प का हाल है, तो परमात्मा का कैसा होगा ? परमात्मा जगह जगह पर भटकने वालों को अपना पल्लू नहीं पकड़ाता, उनसे छुड़ाता है ।
एक साधक की, एक भक्त की उदासी कैसी होती है ? वह इन बातों पर उदास नहीं होता, जिन बातों पर हम सामान्य व्यक्ति उदास होते हैं । मैं एक भक्त की बात कर रहा हूं । कठिनतम उपलब्धि है, जीवन की भक्त बनना ।
वह सब भक्त, जिसे परमात्मा भक्त कहे । अगला अध्याय इसी पर है, मुझे कौन प्रिय है ? भगवान श्री वर्णन करेंगे बाहरवें अध्याय में, ऐसा ऐसा ऐसा ऐसा करने वाला भक्त मुझे प्रिय है पार्थ । अनेक सारे गुण बताएंगे। ऐसे भक्त की उदासी का कारण क्या है ? आज एक भक्त को स्वप्न आया । इसी भजन पर है देवियों अभी बात । ग्यारहवें अध्याय की बात बाद में ।
देवदूत खड़े हैं, हाथ में सूची पकड़ी हुई है। स्वयं भक्त पूछता है, क्या सूची है आपके हाथ में ? उन भक्तों की सूची है जो परमात्मा से प्यार करते हैं । मेरा नाम भी देखो कहीं होगा सूची में ? नहीं, पन्ने पलटे, पृष्ठ पलटे, तेरा नाम सूची में नहीं है । आंख खुल गई। बहुत उदास । दिनभर उदासी ही उदासी । क्षण प्रतिक्षण बढ़ने वाली उदासी ।
मैं परमात्मा के अतिरिक्त और किसी को प्यार करता ही नहीं ।
यदि किसी बंदे की सेवा भी करता हूं, तो परमात्मा का रूप देख कर । मैं किसी बंदे की सेवा नहीं करता, अपने परिवार की सेवा नहीं करता, संसार की सेवा नहीं करता, इनके लिए जो कुछ भी करता हूं, नारायण समझकर करता हूं, परमात्मा समझकर करता हूं । बड़ा
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