*श्री भक्ति प्रकाश भाग [880]**सर्वशक्तिमान परमेश्वर**
Автор: Bhakti me Shakti
Загружено: 2026-02-17
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Ram bhakti @bhaktimeshakti2281
परम पूज्य डॉ विश्वामित्र जी महाराज जी के मुखारविंद से।
((1885))
धुन :
पतित पावनी परम पुनीता
जय मां सीता जय मां सीता,
पतित पावनी परम पुनीता
जय मां सीता जय मां सीता ।।
श्री भक्ति प्रकाश भाग [880]
सर्वशक्तिमान परमेश्वर
"जाहि विधि राखे राम
ताहि विधि रहिए”
राम नाम की माला तो देवियो सज्जनो प्रेम पूर्व ही फेरनी चाहिए । आज भगवान ने कहा है ना, जो मुझे भक्ति भाव से भजता है, भेद केवल इतना है, जो मुझे भक्ति भाव से भजता है, वह मुझ में है, और मैं उसमें हूं । यह कोई छोटी बात नहीं; वह मुझ में है, मानो मैं उसे संसार में नहीं रहने देता । सुन रहे हो ना आप सब । सामान्य व्यक्ति तो संसार में रहता है । जो मुझे भक्ति भाव से भजता है, मैं उसे संसार में नहीं रहने देता । अपने भीतर उसे रखता हूं । कितनी उच्च बात, कितना उच्च आश्वासन दिया है भगवान श्री ने । अतएव माला तो देवियो सज्जनो प्रेम पूर्वक ही फेरनी चाहिए । उस परमात्मा का नाम उस सर्वशक्तिमान परमेश्वर का नाम “राम” प्रेम पूर्वक ही जपना चाहिए इसी में ही भलाई है । ऐसों का ही योग क्षेम परमात्मा स्वयं वहन करता है ।
जगन्नाथ मिश्र की चर्चा चल रही थी । जगन्नाथ पुरी के रहने वाले, जगन्नाथ मिश्र चार भाई । तीन छोटे है यह सबसे बड़े हैं । तीनों का व्यापार बहुत अच्छा है । यह कुछ करते नहीं, संसार की दृष्टि में । संसार की दृष्टि में यह कुछ नहीं करते । राम-राम जपने वाला तो माना जाता है, कुछ नहीं करता । ना बेचारे की दुकान है, ना नौकरी है । तो कुछ नहीं करता । जगन्नाथ मिश्र भी ऐसा
ही । खाना खा कर मंदिर में चला जाता है । जाकर पूरी महाभारत पर टीका लिखी है । आजकल गीता जी पर टीका चल रही है । लिख रहे हैं, अनुवाद भी कर रहे हैं और व्याख्या भी कर रहे हैं । भाइयों का business बहुत बढ़ा-चढ़ा हुआ है । संत महात्मा कहते हैं, जगन्नाथ मिश्र के कारण। वह इस बात को माने ना माने; वह उनकी इच्छा है । पर संत महात्मा तो कहते हैं कि हम सत्य जानते हैं; यह इतना business जो चल रहा है, यह उनके अपने कर्म नहीं। यह जगन्नाथ मिश्र के कर्म । अपनी प्रारब्ध भी होगी, लेकिन प्रारब्ध से बढ़कर जो परमात्मा देता है, तो वह किसी भक्त के कारण । वह प्रारब्ध के अनुसार नहीं, जब परमात्मा देता है । अलग कर लिया है business.
खाता है, कुछ करता नहीं है । जेठ भाभियों ने पट्टी पढ़ाई पतियों को, अलग कर दिया । कोई चिंता नहीं । ठीक है ।
"जाहि विधि राखे राम
ताहि विधि रहिए”
घर बिक गया है । एक कमरा बाकी रह
गया । अब कोई उधार भी देने को तैयार नहीं है । आज वह स्थिति आई हुई है, जिस वक्त घर में खाने को एक अन्न का दाना नहीं है । पत्नी घर भूखी बैठी हुई है । मिश्र जी को भी इस बात का बोध है । खाने को कुछ नहीं मिला, सुबह भूखे पेट घर से निकले हैं ।
बाईसवां श्लोक आया । ऐसों का योग क्षेम मैं स्वयं वाहन करता हूं । लगा यदि सत्य है तो ऐसी नौबत मेरे ऊपर नहीं आनी चाहिए थी । उसे विश्वास है मैं नित्य निरंतर नाम स्मरण करने वाला हूं । भक्ति भाव में हर वक्त डूबा रहता हूं । तन्मय रहता हूं । ऐसों के लिए ही कहा है भगवान ने, उनका योग क्षेम मैं स्वयं वाहन करता हूं । मेरे साथ ऐसी स्थिति क्यों ? लगा है भगवान को गलती लगी है। अतएव वहां
“वह्मम्यंहम्" मैं स्वयं योग क्षेम वाहन करता हूं, उसे काट कर तो उसमें “तदा” लिख दिया। तीन अक्षर, ढाई अक्षर काटे हैं, ढाई अक्षर और लिख दिए । काटा मार कर उसके ऊपर लिख दिया, I am correct it. Correct करने के बाद मिश्र सागर के किनारे सैर करने के लिए चले । नहाने धोने के लिए गए हैं । उधर मिश्राणी घर पर अकेली है । एक नन्हा सा बालक सिर पर आटा दाल की गठरी उठाए हुऐ, कुछ मिष्ठान भी है, सिर पर बोझा उठाए हुए हैं । मिश्राणी का बड़े प्रेम से द्वार खटखटाता है । मनमोहक बालक । नजर नहीं हटाई जा सकती उसके मुख से । मिश्राणी ने द्वार खोला । मुग्ध हो गई बच्चे पर । मानो ऐसा लगे की मैं इसे अपनी छाती से लगा लूं । कौन हो बेटा आप ? कहा मिश्र जी का नौकर हूं, सेवक हूं । यह सामान उन्होंने भेजा है, आप रख लीजिएगा । यह मुख पर क्या हुआ है । चोट लगी हुई थी, मानो थप्पड़, जैसे मुख सूजा हुआ हो, और होंठ से थोड़ा सा खून निकल रहा हो । मिश्र जी ने मारा है, बालक कहता है ।
भगवान, देवियो सज्जनो बड़े कौतुकी है । बहुत आनंद लेते हैं ऐसी बातों का । मिश्र ने मारा है थप्पड़ । मारा मेरे मुख पर । देखो मेरे मुख से, मेरे होठ से खून निकल रहा है । आग बबूला हो गई । यह सामान कहां रखूं, बालक पूछता है ? देखो कितनी सरलता, कितनी मासूमियत । सारे जहान का मालिक सिर पर सामान उठाकर आया हुआ है, पूछ रहा है, मिश्राणी जी यह सामान कहां रखूं ? चमत्कारी कृपा है उसकी । कैसा स्वभाव है परमात्मा का । मिश्राणी जी सामान कहां रखूं, सामान पकड़ कर रख लिया । जाने लगे, अंतर्ध्यान होने लगे, तो कहा मिश्र जी पूछे कौन सामान दे गया है, तो कहना वही सेवक, जिसके आपने खड़ताल लगाई थी । वहीं सामान दे गया है ।
जगन्नाथ मिश्र लौटे हैं । सामान रख गए
हुए । रोटी बनने लग गई । लेकिन मिश्राणी अभी भी बहुत क्रुद्ध है । द्वार खोला । द्वार खोलते ही टूट पड़ी मिश्र जी पर । बूढ़े हो गए, सठिया गए, शर्म नहीं आती । वह नन्हा सा बालक, इतना मासूम बालक, इतना कोमल उसका मुख, क्यों थप्पड़ मारा ? वह कह रहा था, मैं नौकर हूं मिश्र का । शर्म नहीं आती तुम्हें ऐसा उससे व्यवहार करते हुए । जगन्नाथ मिश्र समझ नहीं पा रहे, मिश्राणी क्या बात कर रही है । मेरा कोई नौकर नहीं है । मैंने किसी को थप्पड़ नहीं मारा । मैंने किसी को सामान देकर नहीं भेजा । एक क्षण लगा, मिश्र को समझते । जिनके नाम पर खड़ताल लगाई थी, वह गीताचार्य भगवान श्री कृष्ण स्वयं सामान दे गए हैं । मानो यह कह गए हो जो मैंने लिखा वह ठीक है, गलत नहीं है । उसी वक्त ठीक किया । काट कर ठीक किया । तू खाना
बना । खाना बनाया । जगन्नाथ मिश्र लौट कर आए हैं । कहा प्रभु मैं खाना नहीं
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