श्री भक्ति प्रकाश भाग [881]**परमेश्वर की करनी में कोई दोष नहीं*
Автор: Bhakti me Shakti
Загружено: 2026-02-18
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Ram bhakti @bhaktimeshakti2281
परम पूज्य डाक्टर श्री विश्वामित्र जी महाराज जी के मुखारविंद से
((1580))
श्री भक्ति प्रकाश भाग [881]
परमेश्वर की करनी में कोई दोष नहीं
परमेश्वर की करनी में देवियो सज्जनो जो भी कोई गलती निकालता है, वह उसका बड़ा गहरा भुगतान भुगतता है । उसकी करनी में कभी गलती ना सोचनी, ना कभी
निकालनी । इसने निकाली है । अतएव देवी इतनी तेरी ही सजा है । मिश्राणी को पहले दर्शन दिए हैं, अब इसके बाद क्या होता है ? खाना बनाया है । मिश्र जी, मिश्राणी जी सब बैठे इंतजार कर रहे हैं, आओगे भोग लगाओगे, तो खाऊंगा । नहीं तो नहीं खाऊंगा तेरा प्रसाद । भगवान श्री उसी रूप में नन्हे बालक बनकर आए हैं । मुख ठीक है, अब निशान नहीं है । जो होंठ कटा हुआ था वह भी सब ठीक हो गया हुआ है। बिल्कुल normal हो कर आए हैं । मानो जो खड़ताल लगाई थी, जो काटा था वह ठीक हो गया, तो ठीक हो गया । कहा मिश्र जो लिखा है ठीक लिखा है, गलत नहीं लिखा । तुम्हें आश्वासन हो गया ना, विश्वास हो गया ना इस बात का ? हां, अब जिंदगी में तुम्हें कभी घाटा नहीं पड़ेगा । भगवान श्री अंतर्ध्यान हो गए हैं ।
तीनो के तीनो व्यापारी भाइयों को घाटे पढ़ने शुरू हो गए है । कखपति हो गए हैं । कखपति हो गए तीनो के तीनो भाई । आए, मिश्र के मत्था टेका, पैरी पैना किया, प्रणाम किया । कहा हमें नौकर रख लो । मालिक बन कर रहो । लेकिन भजन पाठ करो । देवियो सज्जनो इस भजन पाठ को कभी नकारा नहीं समझना । कभी ढोंग नहीं जिंदगी में मानना । संसार में जो भी कुछ किसी को मिलता है, वह भजन पाठ के कारण मिलता है, मैं कैसे विश्वास दिलाऊं आपको । भजन पाठ की महिमा बहुत उच्च है, सत्संग की महिमा बहुत उच्च है । यह लखपति कब कखपति हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता । कौन बचाएगा भजन पाठ बचाएगा ।
आइए अगली बात शुरू करते हैं । बहुत वर्ष पहले की बात नहीं ।
जगन्ननाथ मिश्र के बहुत पहले की बात नहीं है । मुंबई की बात है । एक भक्त किसी वक्त लखपति थे । आज कखपति है । भक्तों के साथ भी यह सब कुछ होता है । प्रारब्ध तो साथ ही है ना । वह प्रारब्ध हीन तो नहीं है । वह भी तो अपने प्रारब्ध लेकर आया हुआ
है । आज कखपति हो गया है, so what । लेकिन भजन पाठ नहीं छोड़ा । मानो बाहर से गरीब है, अंदर से मालामाल है । बात तो अंदर की है ना, अंदर क्या है ? अंदर से मालामाल है । नाम की कमाई, राम राम जपता है, प्रेम पूर्वक जपता है । जिस किसी के साथ भी कोशिश करता है काम खोलने की, नौबत इस प्रकार की आ गई है, मैं किसी के साथ भी अपना कारोबार खोलूं, जिस किसी के साथ भी कारोबार खोलता है, उसको भी घाटा पड़ता है । मुस्कुराकर कहता है, वाह राम ! लगता है तुझे मेरा नाम याद हो गया है । जिस किसी के साथ लगता है, उस किसी को घाटा पड़ जाता है । मुझे तो घाटा पड़ता ही है, लेकिन जिस जिस के साथ मेरा नाम जुड़ता है, उस को भी घाटा पड़ जाता है । मुस्कुराकर कहता है परमात्मा ऐसा लगता है तुम्हें मेरा नाम याद हो गया
है । मानो प्रसन्न है ।
परमेश्वर से क्या प्रार्थना करता है । प्रार्थना अर्थात बातचीत है ना । प्रार्थना का अर्थ अर्थात परमात्मा से प्रेम पूर्वक वार्तालाप । इसी को प्रार्थना, बड़े आदमी को हुक्म तो नहीं किया जा सकता । बड़े आदमी के साथ आप बातचीत करने की हिम्मत कैसे कर सकते हो ? हां प्रार्थना कर सकते हो, हाथ जोड़कर निवेदन कर सकते हो । वह इतना बड़ा है उससे जब भी बात करो प्रार्थना ही करना, निवेदन ही करना । मेरा निवेदन है, सविनय निवेदन है, मेरी प्रार्थना है इत्यादि इत्यादि । उससे बातचीत करने की जैसे मित्र एक दूसरे के साथ करते हैं, कैसे हिम्मत कर सकता है । कोई, एक सहेली दूसरी सहेली के साथ करती है, देवरानी जेठानी के साथ करती है । कैसे हिम्मत कर सकता है, कोई परमात्मा के साथ इस प्रकार से बातचीत करने का । तो प्रार्थना, क्या प्रार्थना करता
है । कहता है, प्रभु मैं यह नहीं कह रहा की मेरी गरीबी मिटा दो । मुझे दुख सिर्फ इस बात का होता है मैंने जिन से ऋण लिया हुआ है, जब वह मुझसे मांगने आते हैं और मैं दे नहीं पाता तो मुझे बहुत कष्ट होता है । मुझे उलहाने देते हैं । यह उलहाने मुझसे सुने नहीं जाते । उलहाने भी क्या ?
और कर भक्ति, और कर अमृतवाणी का पाठ कर, जा सत्संग में, जा श्री राम शरणम्, इत्यादि इत्यादि ।
यह उलहाने सुनने पड़ते हैं, तो मुझे दुख होता है । एक दिन प्रार्थना की, दो दिन प्रार्थना की । तीसरे दिन एक व्यक्ति आया
है । कोई कहीं का लाला है । आकर कहा - सेठ यह तीन हजार रूपये रख । मुझे टोपियां बना दो । टोपियों का व्यापार होगा उसका । बनाता होगा, बनवाता होगा । जो कुछ भी करता होगा । इस तीन हजार रूपये की टोपियां बना दे । मेरा पता जानने की जरूरत नहीं । एक महीने बाद आऊंगा । टोपियां ले जाऊंगा । सच्ची कथाएं हैं
देवियो । कोई ऐसी कहानी आपको नहीं सुनाई जा रही, जो बनाई हुई हो । सच्ची कथाएं हैं । शास्त्र में लिखी हुई वर्णित कथाएं आपबीती जैसे होती हैं । तीन हजार रूपये देकर चले गए हैं । मेरा पता पूछने की जरूरत नहीं । खुद ही आऊंगा एक महीने के बाद। आऊंगा, आकर टोपियां ले जाऊंगा । उन तीन हजार रूपये में क्या चीज थी, परमात्मा ही जानता है, मालामाल हो गया वह सेठ ।
कहानी लिखने वाले कहते हैं, सेठ मर भी गया, लेकिन टोपियां लेने कोई नहीं आया । योग क्षेम में वाहन करता हूं । जो निरंतर, विश्वास पूर्वक, निष्काम भाव से मेरा भजन पाठ करता है, जो मेरे से जुड़ा रहता है, भीतर से जुड़ा रहता है, सिमरन के माध्यम से, सतत् स्मरण के माध्यम से, मेरे से जुड़ा रहता है, उसका योग क्षेम मैं स्वयं वाहन करता हूं ।
जारी रखेंगे साधक जनो इस चर्चा को और आगे ।
तनिक संदेह नहीं करना ।
"बंदा सोचे मैं किया, करनहार करतार”
एक भक्त की भावना होनी चाहिए । मात्र भावना नहीं विश्वास होना चाहिए । आप सामान्य बंदे नहीं हो
“बंदा सोचे मैं किया
करनहार करतार ।
तेरा किया ना होवेगा
होवे होवनहार”
यह प्रत्यक्ष परमात्मा दिखाता है, साधक जनो, साधकों
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