SEM 1 LECTURE 2 पृथ्वी और सौरमंडल की उत्पत्ति, चैम्बरलिन और मोल्टन, जीन और जेफरीज, ओटो स्मिड
Автор: Dept. of Geo MLSM COL
Загружено: 2026-01-08
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चैम्बरलिन और मोल्टन की 'ग्रहाणु परिकल्पना' (Planetesimal Hypothesis) पृथ्वी और सौरमंडल की उत्पत्ति की व्याख्या करने वाले महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक है। इसे 1905 में अमेरिकी भूविज्ञानी टी.सी. चैम्बरलिन और खगोलशास्त्री एफ.आर. मोल्टन ने प्रतिपादित किया था।
यह एक द्वैतवादी (Dualistic) संकल्पना है, जिसका अर्थ है कि इसमें सौरमंडल की उत्पत्ति के लिए दो तारों (सूर्य और एक अन्य विशाल तारा) की भूमिका मानी गई है।
परिकल्पना के मुख्य बिंदु:
दो तारों का सिद्धांत: शुरुआत में अंतरिक्ष में दो तारे थे—एक हमारा आदि-सूर्य (Proto-Sun) और दूसरा एक विशाल भ्रमणशील तारा (Intruding Star)।
ज्वारीय बल (Tidal Force): जब वह विशाल तारा सूर्य के बहुत करीब से गुजरा, तो उसके शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण बल के कारण सूर्य की सतह से भारी मात्रा में गैसीय पदार्थ बाहर निकल आया।
ग्रहाणुओं का निर्माण: सूर्य से निकला यह पदार्थ धीरे-धीरे ठंडा हुआ और छोटे-छोटे ठोस कणों में बदल गया। चैम्बरलिन ने इन छोटे ठोस कणों को ही 'ग्रहाणु' (Planetesimals) कहा।
ग्रहों का विकास: समय के साथ ये ग्रहाणु आपस में टकराने लगे और गुरुत्वाकर्षण के कारण एक-दूसरे से जुड़कर बड़े पिंडों में बदल गए। इन बड़े पिंडों ने धीरे-धीरे ग्रहों (Planets) का रूप ले लिया।
इस परिकल्पना की विशेषताएं:
पृथ्वी की अवस्था: इस सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी शुरू से ही गैसीय नहीं थी, बल्कि ठोस ग्रहाणुओं के जमा होने से बनी थी।
ऊष्मा का स्रोत: ग्रहाणुओं के आपस में टकराने और उनके संकुचित (Compression) होने से पृथ्वी के अंदर ऊष्मा पैदा हुई।
वायुमंडल का निर्माण: जैसे-जैसे पृथ्वी का आकार बढ़ा, उसके गुरुत्वाकर्षण ने गैसों को पकड़ना शुरू किया, जिससे वायुमंडल बना।
आलोचना (Criticism):
यद्यपि यह सिद्धांत काफी समय तक मान्य रहा, लेकिन बाद में वैज्ञानिकों ने इस पर कुछ सवाल उठाए:
कोणीय संवेग (Angular Momentum): यह सिद्धांत यह समझाने में पूरी तरह सफल नहीं रहा कि ग्रहों में इतना अधिक कोणीय संवेग कैसे आया।
दूरी की समस्या: सूर्य से इतनी दूर निकले हुए पदार्थ के वापस सूर्य के चक्कर लगाने की संभावना गणितीय रूप से कठिन मानी गई।
गैसों का प्रसार: आधुनिक शोध बताते हैं कि सूर्य से निकला गर्म गैसीय पदार्थ ठंडा होकर ठोस होने के बजाय अंतरिक्ष में फैल (Dissipate) गया होता।
निष्कर्ष: आज सौरमंडल की उत्पत्ति के लिए 'निहारिका परिकल्पना' (Nebular Hypothesis) के आधुनिक संस्करणों को अधिक मान्यता प्राप्त है, लेकिन चैम्बरलिन की परिकल्पना ने "ठोस संचय" (Accretion) के विचार को जन्म दिया जो आज भी विज्ञान में महत्वपूर्ण है।
जीन और जेफरीज की ज्वारीय परिकल्पना (Tidal Hypothesis) सौर मंडल की उत्पत्ति की व्याख्या करने वाले सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक है। 1919 में सर जेम्स जीन्स (Sir James Jeans) ने इसे प्रस्तुत किया और 1929 में हेरोल्ड जेफरीज (Harold Jeffreys) ने इसमें कुछ संशोधन किए।
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2. परिकल्पना की मुख्य मान्यताएं (Basic Assumptions)
जीन्स ने अपने सिद्धांत को निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित किया:
आदि सूर्य: प्रारंभ में सूर्य गैस का एक बहुत बड़ा, गर्म और धीरे-धीरे घूमने वाला गोला था।
आगंतुक तारा (Intruding Star): अंतरिक्ष में एक बहुत बड़ा 'साथी तारा' या 'आगंतुक तारा' सूर्य की ओर बढ़ रहा था। यह तारा आकार में सूर्य से कहीं अधिक विशाल था।
प्रभाव: यह तारा एक निश्चित मार्ग पर चल रहा था जो उसे सूर्य के करीब ले आया।
3. ज्वारीय प्रक्रिया का विवरण (Process of Evolution)
जैसे-जैसे विशाल तारा सूर्य के निकट आया, उसने सूर्य की सतह पर अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण प्रभाव डालना शुरू किया।
ब. फिलामेंट (Filament) का निर्माण
तारा जैसे-जैसे निकटतम बिंदु पर पहुँचा, सूर्य की सतह से एक सिगार के आकार का गैसीय पदार्थ बाहर निकल गया। इसे 'फिलामेंट' कहा गया।
यह बीच में से मोटा और किनारों (दोनों सिरों) पर पतला था।
यह आकृति इसलिए बनी क्योंकि तारे का प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ा, चरम पर पहुँचा और फिर तारा दूर जाने लगा।
स. तारे का दूर जाना
अंततः, वह आगंतुक तारा अपने पथ पर आगे बढ़ गया और सूर्य से दूर चला गया। लेकिन जो गैसीय फिलामेंट सूर्य से बाहर निकल चुका था, वह न तो तारे के साथ जा सका (दूरी अधिक होने के कारण) और न ही वापस सूर्य में मिल सका।
4. ग्रहों का निर्माण (Formation of Planets)
तारे के दूर जाने के बाद, फिलामेंट सूर्य के चारों ओर घूमने लगा। समय के साथ, यह फिलामेंट ठंडा होने लगा और संकुचन (Contraction) के कारण छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट गया।
ग्रहों का आकार: फिलामेंट के बीच का हिस्सा सबसे मोटा था, इसलिए सौर मंडल के बीच के ग्रह (जैसे बृहस्पति और शनि) सबसे बड़े बने। किनारों के ग्रह (जैसे बुध और वरुण) छोटे बने।
उपग्रहों का निर्माण: ग्रहों के ठंडा होने के दौरान, सूर्य के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण ग्रहों से भी पदार्थ बाहर निकला, जिससे उपग्रहों (जैसे चंद्रमा) का निर्माण हुआ।
7. आलोचनात्मक मूल्यांकन (Critical Evaluation)
हालाँकि यह सिद्धांत लंबे समय तक लोकप्रिय रहा, लेकिन आधुनिक विज्ञान ने इसमें कई खामियां पाईं:
तारों के बीच की दूरी: अंतरिक्ष इतना विशाल है कि दो तारों का एक-दूसरे के इतने करीब आना सांख्यिकीय रूप से लगभग असंभव है।
निष्कर्ष
जीन और जेफरीज की ज्वारीय परिकल्पना ने ब्रह्मांड विज्ञान के क्षेत्र में एक क्रांति ला दी थी। भले ही आज 'बिग बैंग' और 'आधुनिक निहारिका सिद्धांत' अधिक मान्य हैं, लेकिन इस परिकल्पना ने यह समझने में आधारशिला का काम किया कि ग्रहों का निर्माण आकस्मिक घटनाओं और गुरुत्वाकर्षण बलों का परिणाम हो सकता है।
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