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Автор: kabir Das Bhajan
Загружено: 2026-02-02
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"पाहन पूजे हरि मिलें" संत कबीर दास जी का अत्यंत प्रसिद्ध और गहन दोहा है। इस अमर वाणी में कबीर जी ने मूर्ति‑पूजा, आडंबर और सच्ची भक्ति का महत्व स्पष्ट किया है। वे कहते हैं कि यदि पत्थर (पाहन) पूजने से हरि (भगवान) मिलते, तो हर कोई पत्थर पूजकर ही मुक्ति पा लेता। लेकिन सच्चाई यह है कि परमात्मा केवल नाम‑स्मरण, भक्ति और गुरु की शरण से ही मिलते हैं।
इस दोहे का भाव है – "पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजूँ पहार" अर्थात यदि पत्थर पूजने से भगवान मिलते, तो मैं पहाड़ को ही पूजता। कबीर जी हमें यह सिखाते हैं कि बाहरी आडंबर और मूर्ति‑पूजा से आत्मा को परमात्मा से जोड़ना संभव नहीं है। असली साधना भीतर है – नाम‑स्मरण और गुरु की कृपा ही वह मार्ग है जो जीव को सच्ची मुक्ति और शांति प्रदान करता है।
🌿 भजन/दोहा का आध्यात्मिक संदेश
मूर्ति‑पूजा की निरर्थकता: पत्थर पूजने से परमात्मा नहीं मिलते।
सच्ची साधना: नाम‑स्मरण और ध्यान ही आत्मा को शुद्ध करते हैं और परमात्मा से जोड़ते हैं।
गुरु का महत्व: गुरु ही वह शक्ति हैं जो जीव को सही मार्ग दिखाते हैं।
मोह‑माया से मुक्ति: सांसारिक आडंबर क्षणिक हैं, केवल भक्ति शाश्वत है।
जीवन का उद्देश्य: आत्मा को परमात्मा से जोड़ना ही साधना का सार है।
🎶 भावनात्मक प्रभाव
यह दोहा सुनते समय श्रोता को गहरी आत्मिक जागृति और जीवन के सत्य की अनुभूति होती है। कबीर जी की वाणी हमें यह याद दिलाती है कि परमात्मा बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि भीतर की साधना और नाम‑स्मरण से मिलते हैं।
🌟 निष्कर्ष
"पाहन पूजे हरि मिलें" केवल एक दोहा नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन है। कबीर जी की वाणी हमें यह सिखाती है कि परमात्मा बाहरी आडंबर और मूर्ति‑पूजा से नहीं मिलते। गुरु की शरण और नाम‑स्मरण ही वह मार्ग है जो जीव को सच्ची मुक्ति और शांति प्रदान करता है। यह दोहा हर उस व्यक्ति के लिए है जो आत्मिक शांति, भक्ति और सत्य की खोज में है
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