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Автор: kabir Das Bhajan
Загружено: 2026-02-09
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"तब लग जीव जग कर्मवश" संत कबीर दास जी का अत्यंत गहन और शिक्षाप्रद भजन/दोहा है। इस अमर वाणी में कबीर जी ने कर्म, संसार और आत्मा की यात्रा का महत्व स्पष्ट किया है। वे कहते हैं कि जब तक जीव कर्मवश है, तब तक वह संसार के बंधनों में बंधा हुआ है। मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार जन्म‑मरण के चक्र में घूमता रहता है और मोह‑माया में उलझा रहता है।
इस दोहे का भाव है – "तब लग जीव जग कर्मवश" अर्थात जब तक जीव कर्मों के अधीन है, तब तक वह संसार में बंधा रहेगा। कबीर जी हमें यह सिखाते हैं कि केवल गुरु की शरण और सतनाम ही वह शक्ति है जो जीव को कर्मबंधन से मुक्त कर सकती है।
🌿 भजन/दोहा का आध्यात्मिक संदेश
कर्म का महत्व: जीव अपने कर्मों के अनुसार संसार में बंधा रहता है।
संसार का बंधन: मोह‑माया और कर्म जीव को जन्म‑मरण के चक्र में बाँधते हैं।
गुरु का मार्गदर्शन: गुरु ही वह शक्ति हैं जो जीव को सही दिशा दिखाते हैं।
भक्ति का सार: नाम‑स्मरण और ध्यान ही आत्मा को शुद्ध करते हैं और परमात्मा से जोड़ते हैं।
जीवन का उद्देश्य: आत्मा को परमात्मा से जोड़ना और कर्मबंधन से मुक्त होना ही साधना का सार है।
🎶 भावनात्मक प्रभाव
यह दोहा सुनते समय श्रोता को गहरी आत्मिक जागृति और जीवन के सत्य की अनुभूति होती है। कबीर जी की वाणी हमें यह याद दिलाती है कि जब तक जीव कर्मवश है, तब तक वह संसार में बंधा रहेगा। केवल गुरु की शरण और सतनाम ही उसे मुक्ति दिला सकते हैं।
🌟 निष्कर्ष
"तब लग जीव जग कर्मवश" केवल एक दोहा नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन है। कबीर जी की वाणी हमें यह सिखाती है कि जब तक जीव कर्मों के अधीन है, तब तक वह संसार में बंधा रहेगा। गुरु की शरण और नाम‑स्मरण ही वह मार्ग है जो जीव को सच्ची मुक्ति और शांति प्रदान करता है। यह दोहा हर उस व्यक्ति के लिए है जो आत्मिक शांति, भक्ति और सत्य की खोज में है
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