प्रवचनसार #1,2 | मंगलाचरण | Manglacharan | Pravachansaar | मुनि श्री प्रणम्य सागर जी
Автор: Muni Shri Pranamya Sagar Ji Ke Bhakt
Загружено: 2019-01-05
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एस सुरासुरमणुसिंदवंदिदं धोदघादिकम्ममलं ।
पणमामि वड्माणं तित्थं धम्मस्स कत्तारं ॥ १॥
अन्वयार्थ- (एस) यह में (सुरासुरमणुसिंदवंदिदं) जो सुरेन्द्रों, असुरेन्द्रों और नरेन्द्रों से वदित है तथा जिन्होंने (धोदघादिकम्ममलं) घातिकर्म मल को धो डाला है, ऐसे (तित्थं) तीर्थरूप और (धम्मस्स कत्तार) धर्म के कर्ता (वमाणं) श्री वर्धमानस्वामी को (पणमामि) नमस्कार करता हूँ।
सेसे पुण तित्थयरे ससव्वसिद्धे विसुद्धसब्भावे।
समणे य णाणदंसणचरित्ततववीरियायारे॥ २॥
अन्वयार्थ- (पुण) और (विसुद्धसब्भावे) विशुद्ध सत्ता वाले (सेसे तित्व
तीर्थंकरों को (ससव्वसिद्धे) सर्व सिद्ध भगवन्तों के साथ ही (य) और (णाषा
चरित्ततववीरियायारे) ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार तथा वीर्याचार युक्त (समः । श्रमणों को नमस्कार करता हूँ।
मुनि श्री आचार्य कुंदकुंद देव विरचित प्रवचन सार जी महान ग्रंथराज का मंगलचरन करते हुए बताते हैं कि कुंदकुंद स्वामी वर्धमान महावीर स्वामी को सर्व प्रथम नमस्कार कर रहे हैं। भगवान सिद्ध बन गए हैं परंतु उनकी अरिहंत अवस्था को मुख्य रूप से यहाँ पर नमस्कार किया जा रहा है। उनकी विशेषताओं का वर्णन इस पहली गाथा के माध्यम से हो रहा है। उन्होंने अपने सारे कर्मों का नाश कर दिया है और वे धर्म के कर्ता हैं, ऐसे वर्धमान भगवान को मेरा नमस्कार हो। दूसरी गाथा में पूज्य श्री शेष तीर्थंकर भगवानो को नमस्कार कर रहे हैं, जो सिद्ध हो गए हैं और अपने विशुध स्वभाव में ही परिणमन कर रहे हैं । पंचाचरण से सहित श्रमणों को भी नमस्कार किया जा रहा है ।मुनि श्री कायोत्सर्ग का अर्थ और महत्व समझाते हुए श्रावकों को संबोध रहे हैं।
Contributed by: Aashna Jain, New Delhi
Date: 2018-07-30
Gatha: 001-002
Granth: Pravachansar
Pravachan: Muni Shri Pranamya Sagar ji
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