प्रवचनसार
Автор: Muni Shri Pranamya Sagar Ji Ke Bhakt
Загружено: 2019-07-05
Просмотров: 5376
Описание:
जो तं दिट्ठा तुट्ठो अब्भुट्ठित्ता करेदि सक्कारं ।
वंदणणमस्सणादिहिं तत्तो सो धम्ममादियदि ।। १०० ॥
अन्वयार्थ - ( जो ) जो भव्य पुरुष ( त ) उन श्रमण को ( दिवा ) देखकर ( तद्वो ) संतुष्ट होता हुआ ( अब्भुट्ठित्ता ) उठकर के ( वंदणणमस्सणादिहिँ ) वन्दना , नमस्कार आदि के द्वारा ( सक्कार ) सत्कार ( करेदि ) करता है । (तत्तो ) इन क्रियाओं से ( सो ) वह भव्य जीव ( धम्म ) धर्म को ( आदियदि ) धारण करता है ।
तेण णरा व तिरिक्खा देवे वा माणुसिं गदिं पप्पा ।
विहविस्सरिएहिं सया संपुण्णमणोरहा होंति ॥ १0१ ॥
अन्वयार्थ - ( तेण ) उस धर्म से वह वर्तमान में ( णरा ) मनुष्य ( व ) अथवा ( तिरिक्खा ) | तिर्यञ्च ( देवे ) देवगति में ( वा ) अथवा ( माणुसिं गदिं ) मनुष्यगति को ( पप्पा ) प्राप्त करके । ( विहविस्सरिएहिं ) वैभव और ऐश्वर्य के साथ ( सया ) निरन्तर ( संपुण्णमणोरहा ) सम्पूर्ण मनोरथों । को ( होंति ) पाते हैं ।
Date: 2018-09-26
Gatha: 100-101
Granth: Pravachansar
Pravachan: Muni Shri Pranamya Sagar ji
Повторяем попытку...
Доступные форматы для скачивания:
Скачать видео
-
Информация по загрузке: