प्रवचनसार
Автор: Muni Shri Pranamya Sagar Ji Ke Bhakt
Загружено: 2019-01-05
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ते ते सव्वे समगं समगं पत्तेगमेव पत्तेगे।
वंदामि य वट्टते अरहंते माणुसे खेत्ते ॥ ३ ॥
अन्वयार्थ (ते ते सव्वे) उन उन सबको (य) तथा (माणुसे खेत्ते) मनुष्य क्षेत्र में विद्यम्
अरहंते) अरहन्तों को (समगं समगं) साथ ही साथ समुदाय रूप से और (पत्तेगमेवपत्तेगं) प्रत्ये प्रत्येक को व्यक्तिगत (वंदामि) नमस्कार करता हूँ।
किच्चा अरहंताणं सिद्धाणं तह णमो गणहराएं।
अज्झावयवग्गाणं साहूणं चेव सव्वेसि ॥ ४॥
तेसिं विसुद्धदसण-णाणपहाणासमं समासेज।
वसंपयामि सम्मं जत्तो णिव्वाणसंपत्ती ॥ ५॥
अन्वयार्थ- इस प्रकार (अरहंताणं) अरहन्तों को (सिद्धाणं) सिद्धों को न
आचार्यों को (अज्झावयवग्गाणं) उपाध्याय वर्ग को (चेव) और (सव्वेसिं साहणं),
को (णमो किच्चा) नमस्कार करके।
(तेसिं) उनके (विसुद्धदसणणाणपहाणासमं) विशुद्ध दर्शन ज्ञान प्रधान आ
(समासेज) प्राप्त करके (सम्म उपसंपयामि) में साम्य को प्राप्त करता हूँ (जनो) ।
(णिबाणसंपत्ती) निर्वाण की प्राप्ति होती हैं।
पूज्य श्री इस तीसरी गाथा में मंगलाचरण करते हुए बताते हैं कि आचार्य कुंदकुंद देव मनुष्य क्षेत्र में विद्यमान तीर्थंकरों को नमस्कार कर रहे हैं, जो विदेह आदी क्षेत्रो में विराजमान होते हैं । वे यहीं से ही बैठकर उन्हें नमोस्तु कर रहे हैं। भगवान को नमोस्तु करने से हमारी कषायों में मंदता आती है और हमारे परिणाम अच्छे हो जाते हैं। जैन दर्शन की विशेषता है कि वह वस्तु तत्व स्वाधीन है। पूज्य श्री कहते हैं कि जैन दर्शन में भक्ति का मार्ग स्वाधीन है । पूज्य श्री ४,५ गाथा में मंगलाचरण करते हुए कि आचार्य कुंदकुंद देव गणधर परमेष्ठी को, पाठक परमेष्ठी को, एवं सभी साधू परमेष्ठी को नमस्कार कर रहे हैं। यह नमस्कार उनके विशुद्ध दर्शन, ज्ञान, स्वभाव को प्राप्त करने के लिए किया जा रहा है । इन गाथाओं में मुनि श्री नमस्कार का महत्व और फल समझा रहे हैं।
Contributed by: Aashna Jain, New Delhi
Date: 2018-07-31
Gatha: 003-005
Granth: Pravachansar
Pravachan: Muni Shri Pranamya Sagar ji
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