सम्पूर्ण अवतार वाणी-13,14,15,16
Автор: Andhkar se prakash
Загружено: 2026-02-06
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discription:संपूर्ण अवतार वाणी, संत निरंकारी मिशन की विचारधारा का सार है, जिसे बाबा अवतार सिंह जी द्वारा रचित 1957 की 'अवतार बानी' के विस्तारित रूप में 1965 में प्रकाशित किया गया था। यह दिव्य ज्ञान, ईश्वर की निराकार सत्ता, गुरु महिमा, और मानव प्रेम पर आधारित है, जो मूल रूप से पंजाबी कविता में है और कई भाषाओं में उपलब्ध है।
संपूर्ण अवतार वाणी के मुख्य विवरण:
लेखक और प्रकाशन: यह शहनशाह बाबा अवतार सिंह जी के विचारों का संग्रह है। इसका पहला संस्करण 1957 में आया, जबकि 1965 में 'संपूर्ण अवतार बानी' प्रकाशित हुई।
मूल संदेश: इस वाणी का सार "ब्रह्मज्ञान" (निराकार ईश्वर की जानकारी) है, जो मानता है कि ईश्वर निराकार है, हर जगह व्याप्त है और गुरु के माध्यम से ही जाना जा सकता है।
विषय-वस्तु: इसमें जीवन को मर्यादित जीने की पद्धति, आपसी प्रेम, गुरु महिमा, अहंकार का त्याग और रूहानी ज्ञान की महिमा का वर्णन है।
भाषाएँ: मूल रूप से यह आसान पंजाबी (गुरुमुखी) में लिखी गई है, जिसमें उर्दू और सिंधी के कुछ छंद भी हैं। अब यह हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, बंगाली, नेपाली, तेलुगु सहित कई भाषाओं में उपलब्ध है।
महत्व: इसे निरंकारी अनुयायी पवित्र ज्ञान के रूप में मानते हैं और इसमें मिशन की सभी शिक्षाएँ सन्निहित हैं।
lyrics:
एक तू ही निरंकार
निरंकार है एक ही सबका यह कोई दो चार नहीं।
तपी तपीश्वर देख सके ना योगी पाएं सार नहीं।
कण कण भीतर वास है इसका देख नहीं नर पाता है।
जब तक हो न गुरु की बख्शिश रूप न यह दिखलाता है।
एक ही ईश्वर हँस रहा है फूलों कलियों उपवन में।
निरंकार है जल थल महियल और रमा है कण कण में।
निरंकार ही वन-उपवन में अपने को दर्शाता है।
शीत चाँदनी ठण्डक बन के हर रस में हर्षाता है।
कर कर यत्न हज़ारों देखे पर यह वश में आया ना।
कहे ‘अवतार’ गुरु ने जब तक परदा दूर हटाया ना।
कहे ‘अवतार’ गुरु ने जब तक परदा दूर हटाया ना।
एक तू ही निरंकार
निरंकार प्रभु है एक ही केवल सत्य है केवल इसका नाम।
यही है कर्ता धर्ता जग का सारी रचना इसका काम।
जन्म मरण में कभी न आए कायम है जो अपने आप।
पूरे गुरु से मांग के रहमत केवल इसका कर ले जाप।
सदा सत्य और पावन है यह पहले था और अब भी है।
कहे ‘अवतार’ एक ही सत्य है कल भी रहेगा अब भी है।
कहे ‘अवतार’ एक ही सत्य है कल भी रहेगा अब भी है।
एक तू ही निरंकार
बेअन्त है रचना इसकी विस्तार का इसके अन्त नहीं।
पार का इसके अन्त नहीं कोई आर का इसके अन्त नहीं।
कोटि कोटि घर बार हैं इसके लाख करोड़ों इसके नाम।
सोच समझ जहां पहुंच न पाए अनगिनत हैं इसके धाम।
इस धरती के नीचे धरती इस से आगे और जहान।
कहे ‘अवतार’ सुनो रे भाई पूरे गुरु से लो पहचान।
कहे ‘अवतार’ सुनो रे भाई पूरे गुरु से लो पहचान।
एक तू ही निरंकार
निरंकार ही सत्य है केवल यही अटल सचाई है।
था भी है भी होवेगा भी रचना खूब रचाई है।
यह ऊंचा है सबसे ऊंचा पावन केवल इसका धाम।
सत्य सत्य बस सत्य यही है पावन केवल इसका नाम।
नीचा भी वह हो जाए ऊंचा जो ऊंचे को जान रहा।
कहे ‘अवतार’ गुरु कृपा से जो इसको पहचान रहा।
कहे ‘अवतार’ गुरु कृपा से जो इसको पहचान रहा।
एक तू ही निरंकार
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