संपूर्ण हरदेव बानी-49,50,51,52
Автор: Andhkar se prakash
Загружено: 2026-02-07
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discription:संपूर्ण हरदेव वाणी संत निरंकारी मिशन के चौथे सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी द्वारा रचित 301 पवित्र काव्यात्मक श्लोकों का संग्रह है। यह मानवता, प्रेम, विनम्रता और ईश्वर-ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) का संदेश देती है। मूल रूप से हिंदी में रचित यह वाणी, ईश्वर को हर जगह देखने और जीवन में सरलता-सेवा-सुमिरन को अपनाने की शिक्षा देती है।
हरदेव वाणी के प्रमुख बिंदु और वर्णन:
सार: इसका मुख्य संदेश "इक तू ही निरंकार" (ईश्वर एक है) के माध्यम से सर्वव्यापी परमात्मा को जानना और उसे हर क्षण याद रखना है।
मानवता का संदेश: यह भेदभाव से ऊपर उठकर विश्व बंधुत्व (Universal Brotherhood) और "मानव को मानव हो प्यारा, एक दूजे का बने सहारा" जैसी मानवीय भावनाओं पर जोर देती है।
भक्ति और जीवन शैली: वाणी में सेवा (निस्वार्थ भाव), सुमिरन (प्रभु याद) और सत्संग (अच्छी संगत) को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने का वर्णन है।
विनम्रता: इसमें अहंकार को त्यागकर विनम्रता से जीने और सब्र (धैर्य) रखने की सीख दी गई है, क्योंकि "सब्र का फल मीठा होता है"।
समकालीन प्रासंगिकता: यह आधुनिक समय में मानसिक अशांति, भय और चिंता से मुक्ति के लिए व्यावहारिक आध्यात्मिकता का मार्गदर्शन करती है।
प्रकाशित भाषा: यह हिंदी में है और अब अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में अनुवादित है।
lyrics:एक तू ही निरंकार
गुरु का जो यशगान करेगा यश दुनिया में पायेगा।
उसकी भी महिमा होगी जो गुरु की महिमा गायेगा।
गुरु की जय जय जो करता है उसकी होती जय जयकार।
गुरु की पूजा जो करता है उसको पूजे कुल संसार।
उसको सजदा सब करते हैं गुरु को करता सजदा जो।
उसके आगे सब झुकते हैं गुरु के आगे झुकता जो।
गुरु का कुछ न घटता बढ़ता कोई गाये न गाये।
कहे ‘हरदेव’ अटल है ये तो जो ध्याये सो फल पाये।
कहे ‘हरदेव’ अटल है ये तो जो ध्याये सो फल पाये।
एक तू ही निरंकार
माया से बचकर रहना है सन्तों ने फ़रमाया है।
मगर न कोई जान सका ये किसको कहते माया है।
वो हर वस्तु माया है जो दूर करे भगवान से।
सेवा सत्संग सुमिरण से और निरंकार के ध्यान से।
धन दौलत ही नहीं है माया पद पदवी भी माया है।
ये माया प्रबल है इसने सबको ही उलझाया है।
लोभ है माया लालच माया अभिमान भी माया है।
मन के अन्दर पाल रखा जो मिथ्या मान भी माया है।
इस माया से आज तलक न कोई भी बच पाया है।
बचा वही है जिस पर गुरु की रहमतों का साया है।
कहे ‘हरदेव’ कि इस दुनिया को ठगती ठगनी माया है।
लेकिन भक्तों ने माया को ठगा है नाच नचाया है।
कहे ‘हरदेव’ कि इस दुनिया को ठगती ठगनी माया है।
लेकिन भक्तों ने माया को ठगा है नाच नचाया है।
एक तू ही निरंकार
ज्ञान लेकर ज्ञान का है जिसने न उपयोग किया।
उसको लाभ मिला न कोई न उसने आनंद लिया।
सिर्फ ज्ञान लेने से कोई बात न बनने वाली है।
बिना कर्म के कभी ज़िंदगी नहीं संवरने वाली है।
ध्यान बिना ये ज्ञान कभी न उतरेगा इस जीवन में।
हर पल हर छिन सुमिरण वाली ज्योत जगानी है मन में।
गुरु ज्ञान से निरंकार को जाना है पहचाना है।
इससे इकमिक हो जाना ही असल में इसको पाना है।
ऊपर ऊपर तैरने वाला हासिल क्या कर पायेगा।
गहराई में जाने वाला मोती चुनकर लायेगा।
मुक्ति का हक़दार वही है ज्ञान को जो जन जीता है।
कहे ‘हरदेव’ कि विष को तज कर नाम का अमृत पीता है।
कहे ‘हरदेव’ कि विष को तज कर नाम का अमृत पीता है।
एक तू ही निरंकार
ज्ञान का सूरज उदय हुआ तो जीवन में उजियारा है।
मन के भीतर से भ्रमों का दूर हुआ अंधियारा है।
ज्ञान का सूरज उदय हुआ तो सही ग़लत को जान लिया।
अविनाशी का पता चला है नश्वर को पहचान लिया।
ज्ञान का सूरज उदय हुआ तो राह नज़र अब आई है।
दर-ब-दर की ठोकरों से बच कर मंज़िल पाई है।
ज्ञान का सूरज उदय हुआ तो हुई है रोशन आत्मा।
कहे ‘हरदेव’ कि देख लिया है कण कण में परमात्मा।
कहे ‘हरदेव’ कि देख लिया है कण कण में परमात्मा।
एक तू ही निरंकार
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