सेवा सुमिरन सत्संग करते हैं पर कृपा नहीं है राजपिता जी के विचार
Автор: Andhkar se prakash
Загружено: 2026-02-06
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सेवा सुमिरन सत्संग करते हैं पर कृपा नहीं है राजपिता जी के विचार #rajpitajikevichar #nirankarivichar #vichar #nirankari #nirankarimission #nirankarisong
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निरंकारी राजपिता रामित जी
के विचार मुख्य रूप से परमात्मा के अहसास, प्रेम, निस्वार्थ सेवा, और सत्संग पर केंद्रित होते हैं। वे सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज की शिक्षाओं के अनुरूप निराकार प्रभु के प्रति समर्पण, सांसारिक मोह से निर्लिप्त होकर भक्ति करने और मानवता के प्रति सेवा भाव को प्रधानता देते हैं।
राजपिता जी के विचारों की मुख्य विशेषताएं:
सेवा और सुमिरन: राजपिता जी जीवन में सेवा (निस्वार्थ कार्य) और सुमिरन (प्रभु का ध्यान) के संतुलन पर जोर देते हैं।
निराकार प्रभु का एहसास: वे सिखाते हैं कि ईश्वर हर जगह है, इसलिए संसार में रहते हुए भी निर्लिप्त (Detached) होकर प्रभु का एहसास करना ही सच्ची भक्ति है।
निर्मल हृदय: वे प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हैं, जहाँ मन से अहंकार का त्याग कर गुरु (सतगुरु) के प्रति समर्पण आवश्यक है।
मानवता: उनके अनुसार, सभी इंसान एक ही परमात्मा की संतान हैं, इसलिए आपसी प्रेम और शांति ही सच्चा धर्म है।
उनके विचारों का उद्देश्य साधारण मनुष्य को सांसारिक जीवन के साथ-साथ आध्यात्मिक जीवन जीने की कला सिखाना है।
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