भक्ति
Автор: Bishwas Pandey
Загружено: 2026-02-06
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Описание:
Written & Composed by Jagadguttam Shri Kripalu Ji Maharaj
Book 📖: Bhakti Shatak & Braj Ras Madhuri
तुम मेरे थे रहोगे,
यह श्रुति बचन तिहार।
अधम उधारन नाथ पुनि,
काहे मोहिं बिसार ।।८१।।
हे श्यामसुंदर ! तुम अनादिकाल से मेरे थे, औऱ अनन्तकाल तक मेरे बने रहोगे, यह वेदों में तुम्ही ने स्वयं कहा है । फिर अधम उधारन श्रीकृष्ण ! मुझे क्यो भूला दिया ?
हौं मानत हौं सदा को,
हौं पातक अवतार।
अधम उधारन विरद पर,
तुम तो करहु विचार।।८२।।
हे श्रीकृष्ण ! अनादिकाल से मैंने सदा पाप ही किया है, यह मैं मानता हूँ । किंतु तुम भी तो अपनी पतित पावनी प्रतिज्ञा पर विचार करो ।
तू ही तो मम बनवारी, पुनि काहे मोहिं बिसारी ।
नहीं चहत पदारथ चारी, हौं तो हौं प्रेम भिखारी ।
याचत भई बेर बिहारी, अब तो सुनु टेर हमारी ।
आयो हौं शरण तिहारी, पुरवहु मम आस मुरारी ।
हौं परम पतित गिरिधारी, तुम हो पतितन हितकारी ।
नहीं चहहुं न्याय बनवारी, चह कृपा 'कृपालु'तिहारी ।।
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