द्वार
Автор: Bishwas Pandey
Загружено: 2026-02-01
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Описание:
Written & Composed by Jagadguttam Shri Kripalu Ji Maharaj
Book 📖: Prem Ras Madira - Dainya Madhuri
द्वार पतित इक आयो री किशोरी राधे।
मांगत भीख प्रेम की यधपि, पात्र संग नहिं लायो री किशोरी राधे।
विष्ठा - विषय हेतु नित अब लौं, शूकर ज्यों भटकायो री किशोरी राधे।
संतन कह्यो नेकु नहिं मान्यो, कियो सदा मनभायो री किशोरी राधे।
जानि जानि अपराध करत नित, नेकहुँ नाहिँ लजायो री किशोरी राधे।
नर तनु हरि हरिजन अनुकंपा, सब ही पाय गँमायो री किशोरी राधे।
तुम बिनु हेतु कृपालु *‘कृपालुहिं’*, पुनि काहे बिसरायो री किशोरी राधे ।
भावार्थ:- हे गहवर वन विहारिणी राधे ! तुम्हारे द्वार पर एक महान् पापी निष्काम - प्रेम की भिक्षा माँगने आया है, किन्तु साथ में शुद्ध अन्त:करण रुपी पात्र नहीं लाया है । हे किशोरी जी ! अनादि काल से सांसारिक विषय वासना रूपी विष्ठा के लिए अब तक शूकर की भाँति चौरासी - लाख योनियों में भटकता रहा । महापुरुषों के बताये हुए आदेशों को स्वप्न में भी नहीं माना तथा सर्वदा मनमाना ही किया । समझ - बूझ कर भी निरन्तर पापों को करते हुए मुझे कभी जरा भी लज्जा नहीं आयी । मानव - देह, तुम्हारी एवं तुम्हारे जनों की अकारण कृपा, इन सब को पाकर भी खो दिया ।
‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हे किशोरी जी ! तुम बिना कारण ही कृपा करने वाली हो, फिर मुझ पतित को क्यों भुला दिया।
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