गरीबी की तपस्या और सुदामा द्वारा श्रीकृष्ण को अर्पित किया गया चावल | श्री कृष्ण महिमा
Автор: Shree Krishna
Загружено: 2026-01-20
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श्री कृष्ण रुक्मिणी को सुदामा के बारे में बताते हैं और दिखाते हैं की सुदामा मेरा परम भक्त है जो मेरा मित्र भी है। सुदामा के बारे में श्री कृष्ण कहते हैं की वह मेरा भक्त है मेरी पूजा करता है मेरा नाम जपता है लेकिन मेरा मित्र होने के कारण वह मुझसे कभी कुछ माँगता नहीं उसके मन में ये बहुत बड़ी झिजक है की मित्र से कैसे माँगू। सुदामा अपनी दरिद्रता को अपना कर्म समझ कर भोग रहा है लेकिन श्री कृष्ण से कभी नहीं कहता की मेरी इस दरिद्रता को दूर कर दो।
सुदामा और उसकी पत्नी दोनों ने दो दिन से कुछ नहीं खाया था और बच्चों को आधा पेट ही भोजन मिला था रात्रि में सुदामा को बर्तनों में से एक चावल का दान मिलता है जिसे सुदामा दो टुकड़े कर एक टुकड़ा अपनी पत्नी को और दूसरा टुकड़ा श्री कृष्ण को भोग के रूप में भेंट करने के लिए रख देता हैं। सुदामा की पत्नी वसुंधरा कहती है की श्री कृष्ण को हमारे इस एक दाने से क्या मिलेगा उन्हें तो आमिर लोग छपन भोग चड़ाते हैं। सुदामा वसुंधरा को कहते हैं की श्री कृष्ण को जो भी अर्पण करोगे वो उन्हें स्वीकार होता है। वसुंधरा भी अपने पति की बात सुन अपने हिस्से का चावल का दाना भी श्री कृष्ण को अर्पण कर देते हैं। श्री कृष्ण उस दाने को स्वीकार कर लेते हैं और रुक्मिणी के साथ बाँट कर खाते हैं। जिसका सेवन करते ही समस्त देवताओं सहित सुदामा और वसुंधरा का पेट भी भर जाता है।
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