तुम ही परमात्मा हो ! | अष्टावक्र गीता 1.19 | Ashtavakra Gita ||
Автор: Nishant Bela
Загружено: 2026-02-28
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परमात्मा अंदर, बाहर नहीं — तुम ही परमात्मा हो! | अष्टावक्र गीता 1.19 | Ashtavakra Gita ||
📜 श्लोक (अध्याय 1, श्लोक 19)
यथा एव आदर्श मध्यस्थे रूपे अन्तः परितः तु सः।
तथा एव अस्मिन् शरीरे अन्तः परितः परमेश्वरः॥
🪔अष्टावक्र गीता के श्लोक 1.19 में महर्षि अष्टावक्र बताते हैं कि जिस तरह दर्पण में प्रतिबिंबित रूप वास्तविक दर्पण का हिस्सा होता है, उसी तरह इस शरीर में ही परमेश्वर स्थित है। बाहर देखने की जरूरत नहीं, तुम स्वयं ही परमात्मा हो। यह श्लोक अद्वैत वेदांत और आत्मज्ञान का गहरा संदेश देता है — जब हम अपने भीतर के अचल और निराकार परमात्मा को पहचानते हैं, तो जीवन के सभी भय, मोह और बंधन समाप्त हो जाते हैं।
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