“तुम शुद्ध-बुद्ध स्वरूप चेतना हो | खुद को तुच्छ मत समझो अष्टावक्र गीता श्लोक 16 |
Автор: Nishant Bela
Загружено: 2026-02-17
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तुम शुद्ध , बुद्ध - स्वरूप चेतना हो , खुद को तुच्छ मत समझो !! अष्टावक्र गीता श्लोक 16 |
त्वया व्याप्तमिदं विश्वं त्वयि प्रोतं यथार्थतः।
शुद्धबुद्धस्वरूपस्त्वं मा गमः क्षुद्रचित्तताम् ॥ 1-16॥
अष्टावक्र गीता का यह दिव्य संदेश कहता है — तुम शुद्ध, बुद्ध स्वरूप चेतना हो। यह सम्पूर्ण संसार तुममें स्थित है। इसलिए खुद को तुच्छ, कमजोर या सीमित मत समझो। अपनी असली पहचान जानो और हीन भावना से मुक्त हो जाओ।
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