साधना एवं दिव्यानुभूती- भाग ३- योगिराज मनोहर हरकरे
Автор: Vaidik Vishwa
Загружено: 2025-10-27
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साधक को जो बीच बीच मे दिव्य प्रकाश का अनुभव आता है वह स्वयं स्पन्दित रहता है। तेजस तत्व का गुण प्रकाश एवं आकार होता है। साधारण व्यक्ति तेजस का गुण प्रकाश समझ सकता परंतु तेजस का गुण आकार क्यों? पृथिवि का गंध, और आप रस, इसी प्रकार यह विषय समझ के बाहर है फिर भी कोशिष करेंगे। उर्जा स्वतंत्र रही तो प्रकाश (Unbottled energy is light) कहते हैं। प्र याने सामने आगे की ओर, 'काश' याने आवरण करते जाना। अर्थात् जो उर्जा स्पंदन करते सामने बढ़ती है, उसे प्रकाश कहते हैं। गुरुत्वाकर्षण रहित क्षेत्र मे यह उर्जा हमेशा प्र' याने आगे की ओर गतिमान रहती है परंतु जिस जिस स्थान पर यह उर्जा गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में आती वहां सामने न बढ़कर स्वतः अपनी धुरी पर घूमने लगती जैसे पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाते समय स्वतः अपनी धुरी पर घूमती है। जब ऊर्जा स्वतः की धुरी पर भ्रमण करने लगती है तब उसमें ओत गुरुत्व (Electro magnatizm) उत्पन्न होकर उसका रूपांतर ओत (Electron) में हो जाता है। ओत विलक्षण गतिसे अपनी धुरी पर भ्रमण करता है यह वैज्ञानिकों को अच्छी तरह मालूम है। ऐसे विभिन्न ओत सापेक्षरीति से दूसरे से इसप्रकार सम्मलित होते हैं कि उनका विघटन असम्भव हो जाता है। (Their relative existance becomes inseparable)इस तरह के एकीकरण से परमाणु उत्पत्ती है और परमाणु से अणु तथा अणू से पदार्थ एवं पदार्थ के समूह से सृष्टि तैयार हुई। अर्थात् ओत के साकार से सृष्टि दृष्टिगोचर है, इसलिये तेजस का गुण आकार माना गया है। अब स्पर्श संबंध जानकारी करें। स्पर्श यह वायतत्व का गुण माना गया है स्पर्श केवल त्वचा के माध्यमसे होता है ऐसा नहीं हैं बल्कि स्पर्श की भावना शरीर के सभी अवयव अनुभव की जाती है। जैसे अधिक खाने से पेट पर दबाव पडकर पेट दुःखता है;मस्तिष्क मे अधिक रक्त संचार से सिर दुखने लगता है, इसप्रकार स्पर्श के अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। स्पर्श की जड़ वास्तविकता न होकर भावना है। टेबल पर हाथ रखने उस टेबल का स्पर्श मालूम पड़ता है। अपने हाथ में अनन्त ओतप्रोत (Electron & proton) रहते हैं उसीप्रकार उस टेबल में भी रहते हैं। पदार्थ विज्ञान के अनुसार दो ओत कभी भी एक दूसरे को स्पर्श नहीं करते क्योंकि ओत गुरुत्वाकर्षण के कारण वे एक दूसरे से अलग ही रहते हैं। अब हाथ के ओत और टेबल के ओत यदि आपस में नहीं मिल सकते तो हाथ टेबल को स्पर्श करता है ऐसा क्यों लगता है? यह सब मन की भावना का नाटक है। मनुष्य को स्पर्श की जानकारी होती है. क्योंकि मनुष्य पास मन है, परंतु टेबल को स्पर्श की जानकारी नहीं है, क्योंकि टेबल के पास उस अर्थ मे मन नहीं है। जहां मन रहता है वहीं स्पर्श होता है, ऐसा भी नहीं है। अर्थात् स्पर्श यह केवल मनकी भावना है यथार्थ नहीं। कुंडलिनी जागृत साधक को बाहय उत्तेजना सिवाय दिव्य स्पर्श का अनुभव होता है।ऐसे साधक के अंगअंग की प्रत्येक पेशी में स्वच्छंद-स्पंदन चलते रहने से दिव्य स्पर्श का अनुभव रहना कोई नई बात नहीं है। दिव्य नाद की भी यही स्थिती रहती है। नाद कान की इंद्रियों से सुनाई देता है, परंतु साधक योगी किसी भी अंग से नाद सुन सकते हैं । जिसे अनाहत नाद कहते हैं। कान के परदेपर वायुलहर से स्पन्दन होकर नाद प्रतीत होता है। नाद के लिये बाह्य उत्तेजक की आवश्यकता होती है। परंतु असाधारण साधक के अंगप्रत्यंग नव चैतन्य से स्पंदीत होते हैं इसलिये उसे कानसे, नाकसे, नेत्रसे दिव्यनाद हमेशा सुनने में आते हैं। वे उसकी दिव्य अवस्था के कारण है। नाद यह गुण तत्वदर्शन में आकाश तत्व का माना गया है। मुलावस्था में विकृती होने से नाद उत्पन्न होता है। प्रकृती की साम्यावस्था में नाद नही, स्पर्श नहीं, आकार नहीं, रस व गंध भी नहीं मिलता। मूलावस्था की आदि अवस्था में नाद नहीं रहता।
"परिमल घ्राणी उरे "
इस पंक्ती पद का उपरोक्त भाव हुआ।
तोहि शक्तिसवे संचरें। मध्यमेमाजी।।
तोहि = वहीं, परिमल= महक या गंध, मध्यमे= सुषुम्ना जागृत साधक कुंडलिनी शक्ति द्वारा दिव्य स्पंदन प्राप्त करता हैl तथा दिव्य स्पंदन में उसे गंध का दिव्य अनुभव मिलता है। दिव्य गंध स्वयंस्फुरित दिव्य कुंडलिनी शक्ति में परिणित होकर (मध्यमे) सुषुम्ना नाडी में संचरित होता है। दिव्य गंध, स्पर्श, नाद, रस आदि की बारंबार अनुभव करने की इच्छा करना उत्तम साधनावस्था प्राप्त करने की दृष्टी से अयोग्य है। एक अवस्था का अनुभव प्राप्त करने के बाद साधक को उसका त्याग कर उससे उच्च अवस्था में जाने का प्रयास करना चाहिये। प्राप्त अवस्था में व्यस्त रहना या बारबार अनुभव लेना अर्थात् एक मेट्रिक पास करने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थी ने पहली कक्षा पास करने के बाद उसी कक्षा में रहने का आग्रह करने जैसा है। बहुत से साधक प्राप्त अवस्था का अनुभव आने पर उसी में लीन रहते हैं जिसके कारण उनकी प्रगति रूक जाती है और साधक श्रेष्ठपदको नहीं पहुंच सकता जैसे सीढी चढ़कर ऊपर जाने के लिये जबतक पीछे की सीढी छोड़ी नहीं जाती तबतक जीना चढ़कर ऊपर नहीं पहुंचा जा सकता। दिव्य अनुभव लेने की अवस्था की प्रगति करके साधक उसे अपनी मूल शक्ति अर्थात् कुंडलिनी शक्ति में परिणित कर उसका संचार सुपम्ना में प्रवेश करता है। इस अवस्था को ज्ञानेश्वर कहते हैं।
।। तोहि शक्ति सवे संचरे मध्यमे माजी
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