2 અષ્ટાંગ હૃદય વૈદ્ય શ્રી બાબુભાઈ એ. નાકરાણી
Автор: Khodidas Sojitra
Загружено: 2026-01-28
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अष्टाङ्गहृदय सूत्रस्थान अध्याय १ ॥ श्लोक ८॥
तैर्भवेद्विषमस्तीक्ष्णो मन्दश्चाग्निः समैः समः
दोषों की अवस्था के अनुसार अग्नि (पाचन शक्ति) का स्वरूप बदलता है —
वात दोष अधिक हो → अग्नि विषम हो जाती है
(कभी तेज, कभी धीमी — अनियमित पाचन)
पित्त दोष अधिक हो → अग्नि तीक्ष्ण हो जाती है
(बहुत तेज पाचन, अधिक भूख, दाह)
कफ दोष अधिक हो → अग्नि मन्द हो जाती है
(भूख कम, भोजन देर से पचना)
तीनों दोष सम अवस्था में हों → अग्नि सम रहती है
(श्रेष्ठ पाचन, उत्तम स्वास्थ्य)
कोष्ठः क्रूरो मृदुर्मध्यो मध्यः स्यात् तैः समैरपि ॥
दोषों की प्रधानता के अनुसार कोष्ठ (आंत्र प्रवृत्ति) का स्वभाव भिन्न-भिन्न होता है—
वात प्रधान → क्रूर कोष्ठ
(मल त्याग कठिन, कब्ज़ प्रवृत्ति)
पित्त प्रधान → मृदु कोष्ठ
(शीघ्र मलत्याग, ढीलापन)
कफ प्रधान → मध्य कोष्ठ
(न अधिक कठोर, न अधिक मृदु)
तीनों दोष सम हों → मध्य कोष्ठ
(स्वाभाविक, नियमित प्रवृत्ति)
विरेचन के समय कोष्ठ को समझना अति जरूरी होता है तब ये श्लोक का महत्व हमे मार्गदर्शन प्रदान करता है।
याद रहे : 13 प्रकार की अग्नि होती है(जठराग्नि, धात्वाग्नि इत्यादि) श्लोक में सिर्फ अग्नि शब्द प्रयोग हुआ है लेकिन भाष्यकार यहां ये अग्नि के गुण जठराग्नि के लिए है ऐसा बता रहे है।
जठराग्नि में पित्त का विशेष स्थान होता है।
कोष्ठ में वायु का विशेष स्थान होता है।
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