3 અષ્ટાંગ હૃદય વૈદ્ય શ્રી બાબુભાઈ એ. નાકરાણી
Автор: Khodidas Sojitra
Загружено: 2026-01-28
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शुक्रार्तवस्थैर्जन्मादौ विषेणेव विषक्रिमेः ॥ ९ ।।
तैश्च तिस्रः प्रकृतयो हीनमध्योत्तमाः पृथक् ।
समधातुः समस्तासु श्रेष्ठा निन्द्या द्विदोषजाः ॥
गर्भाधान के समय शुक्र और आर्तव मे वात, पित्त और कफ की जैसी स्थिति(अवस्था) होती है, उसी के अनुसार जन्म लेनेवाले बालक की प्रकृति बनती है।
जैसे विषैले कीड़े में विष रहता है, वैसे ही मनुष्य की दोष-प्रकृति (वात-पित्त-कफ) भी गर्भाधान के समय शुक्र और आर्तव मे वात, पित्त और कफ की स्थिति (अवस्था) के अनुसार उनमें स्थित हो जाती है।
दोषों के आधार पे तीन अलग अलग प्रकार की प्रकृतियाँ बनती हैं। वायु के दोष से हीन, पित्त के दोष से मध्य और कफ के दोष से उत्तम प्रकृति बनती है, तीनों दोषों का सम रहने पर सम प्रकृति बनती है जो सब में श्रेष्ठ प्रकृति कहलाती है। दो दो दोषों के रहने पर बनती हुई प्रकृति हीन प्रकृति कहलाती है। दो दो दोषों होने पर वात पित्त, वात कफ, पित्त कफ प्रकृति बनती है। ये हीन इसलिए मानी जाती है क्योंकि दो दो प्रकृति के संयोग होने पर अगर दोनों दोष परस्पर विरोधी गुण वाले होंगे तो विकृति लाते है और अगर दोनों समान गुण वाले होने पर वह जुड़ जाते है इसलिए द्वि दोष वाली प्रकृति हीन मानी जाती है।
इस प्रकार कुल सात प्रकार की प्रकृति होती है।
वात, पित्त, कफ, सम, वात पित्त, वात कफ, पित्त कफ
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