मैं सदा मुक्त हूँ, सुख का सागर अहो !
Автор: आत्मन भक्ति धारा
Загружено: 2026-01-27
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मैं सदा मुक्त हूँ,
सुख का सागर अहो !
शाश्वत परमात्मा,
परम ज्ञायक प्रभो।
नहीं प्रमत्त अरु अप्रमत्त भी नहीं,
मैं तो पर्याय निरपेक्ष ज्ञायक प्रभो।मैं सदा मुक्त हूँ,
सुख का सागर अहो !
शाश्वत परमात्मा,
परम ज्ञायक प्रभो। ।
बंध होता नहीं,
मुक्ति किससे बने,
बंध अरु मुक्ति तो मात्र पर्याय है। पर का स्पर्श भी मुझसे होता नहीं, अपने एकत्व से शुद्ध सुन्दर अहो ।मैं सदा मुक्त हूँ,
सुख का सागर अहो !
शाश्वत परमात्मा,
परम ज्ञायक प्रभो।।
हूँ स्वयं सिद्ध अरु नित्य उद्योतमयपरम स्पष्ट चिन्मात्र ज्योति अहा।
क्षीर अरु नीर सम दिखता है मिला,
किन्तु पररूप किंचित् न होता प्रभो
मैं सदा मुक्त हूँ,
सुख का सागर अहो !
शाश्वत परमात्मा,
परम ज्ञायक प्रभो।।
शुभ-अशुभ परिणमन भी बहिर्तत्त्व है,
उनमें तन्मय हुआ मैं कदापि नहीं। निर्विकारी निरंजन निराबाध ध्रुव,
शिव परम ब्रह्म चिन्मात्र ज्ञायक विभो
मैं सदा मुक्त हूँ,
सुख का सागर अहो !
शाश्वत परमात्मा,
परम ज्ञायक प्रभो।।
भूलना निज को ही यह महा मोह है,
निज को नहिं जानना,
ये ही अज्ञान है।
ज्यों का त्यों आत्म प्रभु ज्ञानघन है सदा,
झूठा मोही अज्ञानी उसे तुम कहो ।सुख का सागर अहो !
शाश्वत परमात्मा,
परम ज्ञायक प्रभो।।।
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