आनंद सागर सदा अंतर में बह रहा लिरिक्स-अभिलाषा बेन
Автор: आत्मन भक्ति धारा
Загружено: 2026-02-14
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आनंद सागर सदा अंतर में बह रहा अनंत गुण की लहर से उछल ये रहा
आनंद सागर सदा अंतर में बह रहा,,,,,,
अब न पर्याय परिणाम का भय मुझे अब न लागे है ,,
संसार का डर मुझे
त्रिकाली ध्रुव का मुझे
अब सहारा मिला
मै भगवन हु
अब ये विश्वास जगा
आनंद सागर सदाअंतर मे बह रहा अनंत गुण की लहर से उछल ये रहा
ज्ञान में ज्ञान का ज्ञान हर क्षण हो रहा
ज्ञान की डोर से अब है
ज्ञायक दिखा
ज्ञायक हूँ सदा से मैं
ज्ञायक रहा
ज्ञान की इस लहर से
महक मै रहा
आनंद सागर सदा अंतर मे बह रहा अनंत गुण की लहर से उछल ये रहा
सिद्ध पर्यायें जिसमें से आती रहे अनंती पर्यायों की खान
मैं शुद्धात्मा
रत्नात्रय दातार
रत्नों की खान में
अपने वैभव से
वैभवशाली रहा
आनंद सागर सदा अंतर मे बह रहा अनंत गुण की लहर से उछल ये रहा
क्या कहे कोई महिमा मेरे आत्म की थक गये गुणगाथा
कहकर सभी
भक्ति में आत्मा,
दृष्टि में आत्मा
शक्ति में आत्मा
मै ही परमात्मा
मैं ही ज्ञायक प्रभु हूं
मैं ही ध्रुवआत्मा
आनंद सागर सदा अंतर मे बह रहा अनंत गुण की लहर से उछल ये रहा
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