KRISHNA DUKH 🕉️🥹 | Hindi Spiritual Rap | Bhakti x Hip Hop Fusion || 🔥🔥 Goosebumps Guaranteed 🔥🔥 ||
Автор: KHARGA Official
Загружено: 2026-02-20
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Описание:
KRISHNA DUKH 🕉️🥹 | Hindi Spiritual Rap | Bhakti x Hip Hop Fusion || 🔥🔥 Goosebumps Guaranteed 🔥🔥 ||
In a world full of noise, pain, and confusion, Krishna Dukh is a heartfelt spiritual rap that turns suffering into surrender.
This song is a cry from the soul — calling out to Shri Krishna in moments of darkness, doubt, and inner battles.
Blending devotional emotion with powerful hip hop energy, this track reflects the journey from dukh (pain) to divine faith.
If you believe Krishna listens even when the world doesn’t, this song is for you.
🕉️ Listen with headphones for deeper impact.
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°SONG LYRICS°:-
गर कष्ट गिनाऊं मैं, सांसें भी रुक जाएं,
सच सुनने की हिम्मत है, दिल खुद झुक जाए।
इतिहास के पन्नों को जिंदा कर दूं आज,
पर पहले सुन सको तो, फिर देना तुम आवाज़।
जन्म से पहले ही छाया था काल,
मां देवकी कैद, वासुदेव बेहाल।
छः शिशु गिराए अत्याचार के हाथ,
लोहे की सलाखों में टूटी हर रात।
जेल की दीवारों में जन्मी जो रौशनी,
वो साधारण बालक नहीं, वो थी चेतना अनोखी।
सैनिक जमे जैसे समय हो थम गया,
बंधन टूटे, भाग्य का पहिया घूम गया।
यमुना की लहरें भी चरण छू गईं,
गोकुल की राहें खुद झुक गईं।
मां की गोद से दूर वो चला,
धर्म का इतिहास तभी से लिखा।
तू अपने दुखों को बड़ा समझे है?
उनके आगे सब फीके है।
वो कष्टों में ढलकर दीप बने,
तू सोच भी न सके — वो क्या जीके है।
तू सोच भी न सके — वो क्या जीके है।
तू सोच भी न सके — वो क्या जीके है।
कभी पूतना, कभी बकासुर आया,
हर वार में मृत्यु ने जाल बिछाया।
पर नन्हे हाथों ने खेल बना दिया,
अहंकार का हर ताज गिरा दिया।
कालिया डरा, यमुना साफ हुई,
गोवर्धन उठा तो इंद्र की रात हुई।
एक उंगली पर पर्वत टिका,
भक्ति के आगे देव भी झुका।
प्रेम किया पर साथ न मिला,
हर रिश्ता उनसे दूर चला।
माता-पिता कैद में रोते रहे,
पुत्र वर्षों बाद गले से लगे।
सुदामा आया फटे वस्त्र में,
दरबार हंसा उसके स्वरूप पे।
पर राजसिंहासन छोड़ के दौड़े,
मित्र के चरण स्वयं ही धोए।
सच्ची मित्रता का दिया प्रमाण,
धन नहीं — हृदय था उनकी शान।
झोपड़ी से महल बना डाला,
पर प्रेम का ऋण न कभी टाला।
भरी सभा में मर्यादा रोई,
जब लाज बचाने की बारी हुई।
एक पुकार पे अंबर हिला,
अधर्म वहीं से कांप उठा।
रणभूमि में जब वीर डगमगाया,
ज्ञान का सूरज वहीं उगाया।
स्वरूप दिखा जब सत्य प्रखर,
भय पिघला जैसे पिघले पत्थर।
सोलह हजार आंसुओं को सम्मान दिया,
समाज ने ठुकराया — उन्होंने स्थान दिया।
हर पीड़ा को आश्रय बनाया,
धर्म को जीवन से निभाया।
समंदर के बीच नगर बसाया,
श्राप मिला — सब बहता पाया।
अपनों का अंत स्वयं देखा,
फिर भी मुख पर संतोष रेखा।
वन में बैठे शांत धरा पर,
अंत स्वीकारा सहज धरा पर।
जो जीवन भर कर्म सिखाए,
वो अंत भी कर्म से ही पाए।
दुख उनका सागर था गहरा,
पर चेहरा रहा उजियारा।
तू खुद को कमजोर न समझ,
वो उदाहरण है — सहना क्या होता है सच्चा।
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