Balal main beragan hoongi
Автор: Vrindavan Ras Siddhant
Загружено: 2026-03-07
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बाला में वैरागीन हूँगी।
जिन भेषाँ म्हाँरा साहिब रीझे सो ही वेश धरूँगी।
सील संतोष धरूँ घट भीतर समता पकड़ रहूँगी।
जाको नाम निरंजन कहिये ताकौ ध्यान करूँगी।
प्रेम प्रीत सूँ हरि गुण गाँऊ चरनन लिपट रहूँगी।
गुरू के ज्ञान रँगू तन कपड़ा मन मुद्रा पहनूँगी।
या तन की मैं करूँ कींगरी रसना नाम रटूंगी ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर साँधा संग रहूँगी।
भावार्थ: प्रभु के रंग में रंगी मीरा
1. प्रभु की प्रसन्नता ही मेरा श्रृंगार है
मीरा कहती हैं कि "हे सखी! मैं अब वैरागिन बनूँगी।" वे तय कर चुकी हैं कि वे वही रूप और वेश धारण करेंगी जिसे देखकर उनके 'साहिब' (श्री कृष्ण) प्रसन्न होते हैं। उनके लिए बाहरी दिखावा नहीं, बल्कि प्रियतम की खुशी सर्वोपरि है।
2. आंतरिक गुणों का आभूषण
सच्चा वैराग्य केवल कपड़ों से नहीं आता, इसलिए मीरा कहती हैं कि वे अपने हृदय के भीतर शील (सदाचार) और संतोष धारण करेंगी। वे समता (समभाव) को अपनाएंगी, यानी सुख-दुख और लाभ-हानि में एक समान रहेंगी।
3. अनवरत ध्यान और नाम की महिमा
मीरा उस 'निरंजन' (माया से रहित परमात्मा) का ध्यान करेंगी। वे प्रेम और प्रीति के साथ हरि के गुणों का गान करेंगी और सदैव उनके चरणों से लिपटी रहेंगी (पूर्ण शरणागति)।
4. गुरु ज्ञान और मन का संयम
वे कहती हैं कि गुरु से मिले ज्ञान के रंग में वे अपने शरीर रूपी वस्त्र को रंग लेंगी। वे अपने मन को ही 'मुद्रा' (योगियों द्वारा कान में पहने जाने वाले कुंडल) बना लेंगी, जिसका अर्थ है मन को पूरी तरह वश में कर लेना।
5. शरीर को वाद्य और जिह्वा को जाप बनाना
मीरा कहती हैं कि वे अपने इस शरीर को 'कींगरी' (एक प्रकार का वाद्य यंत्र) बना लेंगी और अपनी जीभ से निरंतर प्रभु का नाम जपेंगी। जैसे यंत्र से संगीत निकलता है, वैसे ही उनके अस्तित्व से केवल कृष्ण नाम निकलेगा।
6. सत्संग का मार्ग
अंत में मीरा कहती हैं कि उनके प्रभु चतुर गिरधर गोपाल हैं। अब वे संसार के मोह-माया को त्यागकर केवल संतों और साधुओं की संगति में रहेंगी।
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