Daf bajyo chhel matvare ko डप बाज्यों री छैल मतवारे को Braj Ki Holi-SK
Автор: Vrindavan Ras Siddhant
Загружено: 2026-03-03
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ढ़फ बाज्यो छैल मतवारे को ॥
ढ़फ की गरज मेरो सब घर हाल्यो, हाल्यो खंभ तिवारे को।
ढ़फ की गरज मेरो सब तन हाल्यो, हाल्यो झुब्बा नारे को।
पुरषोत्तम प्रभु की छबि निरखै, ये रसिया नन्द द्वारे को।
ढफ बाज्यो छैल मतवारे को:
सखी! देखो, वह मनमोहन, वह नटखट छैला (प्रियतम) आ गया है। उसने अपनी मतवाली डफली बजा दी है। यह ध्वनि साधारण नहीं है, यह उसके प्रेम की पुकार है जो हृदय को बेध रही है।
ढफ की गरज मेरो सब घर हाल्यो, हाल्यो खंभ तिवारे को:
उस डफली की गूँज (गरज) ने मेरे पूरे घर को हिला दिया है। यहाँ 'घर' और 'खंभा' केवल मकान के हिस्से नहीं, बल्कि गोपी के सांसारिक बंधन और लोक-मर्यादा के प्रतीक हैं। प्रियतम की पुकार इतनी प्रबल है कि मर्यादा के सारे स्तंभ डगमगा रहे हैं। वह घर (संसार) अब उसे स्थिर नहीं लगने दे रहा।
ढफ की गरज मेरो सब तन हाल्यो, हाल्यो झुब्बा नारे को:
प्रियतम की वह ध्वनि मेरे रोम-रोम (तन) में समा गई है। मेरा शरीर काँप रहा है, मेरा हृदय धड़क रहा है। यहाँ तक कि मेरे वस्त्रों के आभूषण और फुंदने (झुब्बा) भी उस लय में नाचने लगे हैं। यह 'सात्विक भाव' की वह अवस्था है जहाँ भक्त अपने शरीर की सुध-बुध खो देता है।
पुरषोत्तम प्रभु की छबि निरखै, ये रसिया नन्द द्वारे को:
कवि पुरुषोत्तम कहते हैं कि गोपी सब कुछ छोड़-छाड़ कर दौड़ पड़ती है ताकि वह उस परम 'रसिया' की छवि निहार सके। वह रसिया जो नंद बाबा के द्वार पर खड़ा सबको अपने प्रेम रस से सराबोर कर रहा है। वह 'पुरुषोत्तम' (श्रेष्ठ पुरुष/प्रियतम) की उस मोहक छवि को अपनी आँखों में बसा लेना चाहती है।
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