Sakhi Yah! Kaiso Hai Braj Dham -Part 1/8 || सखी यह! कैसो है ब्रज धाम -भाग 1/8
Автор: Radha Govind Mandir, Chandigarh
Загружено: 2022-03-22
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💠वेदों में सर्वोच्च तत्व को 'रस' कहा गया है, 'रसो वै सः'। ईश्वरीय जगत में दिव्य रस की भी अनेक कोटियाँ हैं, जिनमें श्री राधा-कृष्ण का ब्रज रस सर्वोपरि है। यद्यपि 'रस' तत्व को ही शब्दों में व्यक्त कर पाना कदापि सहज नहीं है, पुनः ब्रज रस को समझाने की बात तो सर्वथा असम्भव है। तथापि 'जगद्गुरूत्तम' होने के नाते साधकों के परम लाभ को दृष्टि में रखकर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने दिव्य ब्रज धाम के अतुलनीय एवं अनिवर्चनीय स्वरूप का यत्किंचित् बोध कराने हेतु अपने एक स्वरचित पद 'सखी यह कैसो है ब्रज धाम' की व्याख्या करते हुये कुछ अति महत्वपूर्ण प्रवचन दिये हैं। इस प्रवचन श्रृंखला में रस एवं तत्व ज्ञान दोनों का मनोरम मिश्रण है, जिसे सुनते-सुनते मन अघाता ही नहीं तथा उस दिव्य ब्रज धाम के अलौकिक रस को पाने के लिये व्यक्ति लालायित होने लगता है। भक्ति मार्ग की अनेक भ्रान्तियों को मिटाने वाली एवं आध्यात्मिक जगत के अनूठे रहस्यों को उद्घाटित करने वाली यह विशेष प्रवचन श्रृंखला अवश्यमेव श्रवणीय है।
ये व्याख्यान सन् 1980 से पूर्व काल के हैं तथा इनकी वीडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं है, केवल ऑडियो रिकॉर्डिंग ही प्राप्त है। श्रोताओं के विशेष लाभ के दृष्टिगत हम उसी दुर्लभ ऑडियो को यहाँ वीडियो के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। सभी से अनुरोध है कि आप इस परम लाभदायक विषय का एकाग्रचित्त होकर श्रवण करें एवं अधिकाधिक लाभ प्राप्त करें।💠
इस वीडियो के कुछ अंश हैं—
वेदों की ऋचा स्वरुपा ब्रजांगनाओं को ब्रज की विचित्र स्थिति को देखकर आश्चर्य हो रहा है। और वो कहती है अरी सखी! यह कैसा ब्रजधाम है? जहां कोई न धर्म का विचार करता है न अधर्म का विचार करता है। विश्व में दो ही वस्तु है। एक धर्म, एक अधर्म- एक अच्छा, एक बुरा। और अगर कोई कहे कि ऐसा भी तो हो सकता है कोई व्यक्ति न अच्छा करें न बुरा करें। ऐसा नहीं हो सकता। क्यों? इसलिए कि किसी का भी मन अकर्मा नहीं रह सकता। कर्म तो करना पड़ेगा। अब ये बात अलग है कोई धर्म करें कोई अधर्म करें। तो अधर्म को तो विवेकी लोग निंदनीय मानते ही हैं किन्तु धर्म को न मानना ये बड़े आश्चर्य की बात है। क्योंकि वेद ही जीव के लिए आॉथोरिटी है। ये भगवान के अनादि वाक्य है। ये अपौरुषेय है। अर्थात् किसी व्यक्ति ने वेद का निर्माण नहीं किया, स्वयं भगवान ने नहीं किया। केवल भगवान के श्वास से प्रकट होकर बाहर आए हैं। जैसे ये जीव सृष्टि के आदिकाल में भगवान के महोदर से बाहर आते हैं, ये पूरी सृष्टि बाहर आती है जो कार्य रुप में है। तो वेद केवल प्रकट किये जाते हैं, बनाये नहीं जाते। अरे सृष्टि ही नहीं बनाई जाती तो वेद करता बनाये जाएंगे। ये मायिक सृष्टि, त्रिगुणात्मक सृष्टि, मैटेरियल जगत, ये भी बनाया नहीं जाता। ये सब कुछ अनादिकाल से था। ये प्रलय में भगवान में लीन हो जाता है। ये कार्यावस्था कारणावस्था में पहुॅंच जाती है। जैसे मैंने आपको बहुत बार बताया है कि ये मिट्टी है ये कारण है। और इसकी सुराही बन गई ये कार्य हो गया। रीजन क्या है? मिट्टी। और उसका कार्य क्या है? सुराही। सुराही फूट गई तो फिर मिट्टी बन गई वो, फिर सुराही बन गई, फिर मिट्टी बन गई। ये करोड़ों मकान जो आपलोग देखते है, मंदिर देखते है, मस्जिद देखते हैं, गिरिजाघर देखते हैं, मैखाने देखते हैं ये सब क्या है? अनंत बार सृष्टि में वही मैखाना बना, फिर वही मंदिर बना, फिर वही मस्जिद बनी, फिर वही बड़े-बड़े बंग्ले बने, फ्लैट्स बने। ये सब ऐसे ही बदलता रहता है पृथ्वी वही है।
—जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज
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कलियुग में दान को ही कल्याण का एकमात्र माध्यम बताया गया है। 'दानमेकं कलौयुगे'।
दान पात्र के अनुसार ही अपना फल देता है तथा भगवान एवं महापुरुष के निमित्त किया गया दान सर्वोत्कृष्ट फल प्रदान करता है।
हम साधारण जीव यथार्थ में यह नहीं जान सकते कि वास्तविक महापुरुष के प्रति किया गया हमारा दान/समर्पण हमारे कल्याण का कैसा अद्भुत द्वार खोल देगा। अतएव, समर्पण हेतु आगे बढिये।
आपकी यह दान राशी जीरकपुर (चंडीगढ़) स्थित राधा गोविंद मन्दिर के निर्माण कार्य में प्रयुक्त होगी।
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