Sakhi Yah! Kaiso Hai Braj Dham -Part 2/8 || सखी यह! कैसो है ब्रज धाम -भाग 2/8
Автор: Radha Govind Mandir, Chandigarh
Загружено: 2022-03-24
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💠वेदों में सर्वोच्च तत्व को 'रस' कहा गया है, 'रसो वै सः'। ईश्वरीय जगत में दिव्य रस की भी अनेक कोटियाँ हैं, जिनमें श्री राधा-कृष्ण का ब्रज रस सर्वोपरि है। यद्यपि 'रस' तत्व को ही शब्दों में व्यक्त कर पाना कदापि सहज नहीं है, पुनः ब्रज रस को समझाने की बात तो सर्वथा असम्भव है। तथापि 'जगद्गुरूत्तम' होने के नाते साधकों के परम लाभ को दृष्टि में रखकर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने दिव्य ब्रज धाम के अतुलनीय एवं अनिवर्चनीय स्वरूप का यत्किंचित् बोध कराने हेतु अपने एक स्वरचित पद 'सखी यह कैसो है ब्रज धाम' की व्याख्या करते हुये कुछ अति महत्वपूर्ण प्रवचन दिये हैं। इस प्रवचन श्रृंखला में रस एवं तत्व ज्ञान दोनों का मनोरम मिश्रण है, जिसे सुनते-सुनते मन अघाता ही नहीं तथा उस दिव्य ब्रज धाम के अलौकिक रस को पाने के लिये व्यक्ति लालायित होने लगता है। भक्ति मार्ग की अनेक भ्रान्तियों को मिटाने वाली एवं आध्यात्मिक जगत के अनूठे रहस्यों को उद्घाटित करने वाली यह विशेष प्रवचन श्रृंखला अवश्यमेव श्रवणीय है।
ये व्याख्यान सन् 1980 से पूर्व काल के हैं तथा इनकी वीडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं है, केवल ऑडियो रिकॉर्डिंग ही प्राप्त है। श्रोताओं के विशेष लाभ के दृष्टिगत हम उसी दुर्लभ ऑडियो को यहाँ वीडियो के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। सभी से अनुरोध है कि आप इस परम लाभदायक विषय का एकाग्रचित्त होकर श्रवण करें एवं अधिकाधिक लाभ प्राप्त करें।💠
इस वीडियो के कुछ अंश हैं—
लगभग पाॅंच हजार वर्ष हुए होंगे हमारे इसी मृत्यु लोक में भारत में उत्तर प्रदेश में मथुरा में पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रद्म श्री कृष्ण का अवतार हुआ था। और ऐसा अवतार था जिसमें भगवान उनका नाम, उनका रुप, उनका गुण, उनकी लीला, उनके धाम, उनके संत सबके सब अवतरित हुए थे। तात्पर्य ये कि एक विशिष्ट अवतार हुआ है। जैसा अवतार सदा नहीं हुआ करता। कहीं अंशावतार होता है, कहीं अर्चा अवतार होता है, कहीं आदेशावतार होता है, अनेक प्रकार के अवतार होते हैं। किन्तु ये कृष्णा अवतार परिपूर्ण अवतार था, परा अवस्था अवतार था। तो उस समय कुछ तो गोलोक से जीव आए थे जो नित्य सिद्ध महापुरुष है। अर्थात् भगवान के परिकर है, पार्षद है अनादिकाल से सदा भगवान के साथ रहे हैं, रहेंगे। और कुछ जीव नये उम्मीदवार भी थे, जिनको वो अंतिम रस दान करना था। तो वो बहुत प्रकार के थे कुछ दंडकारण्य के परमहंसों को वरदान दिया था। वे लोग ब्रज में आए थे गोपी बन-बन करके। कुछ अग्नि के पुत्रों को वरदान दिया था। कुछ मिथिला की गोपियों को वरदान दिया था। कुछ वैकुंठ की जीवात्माओं को वरदान दिया था। अनेक प्रकार के जीवों का प्राकट्य ऐसा हुआ था जिसमें उनको प्रथम बार श्री कृष्ण का महारास आदि का रस मिलेगा। तो एक पार्टी उसमें ऐसी थी जो वेद की ऋचाओं की अवतार थी। वेद अनादि है। यद्यपि न्याय वैश्विक दार्शनिकों ने तो ये बताया है कि वेद भगवान के द्वारा प्रनीत है। और वेदान्त ने बताया है कि वेद अनादि है। बात दोनों ठीक है। अनादि भी है, भगवान के श्वास से वेद प्रकट हुए, इसलिए वो भगवान के द्वारा भी निर्मित कहे जा सकते हैं। किन्तु क्योंकि भगवान अनादि है, सृष्टि अनादि है, जीव अनादि है केवल प्राकट्य होता है सृष्टि के समय भगवान के श्वास से वेदों का इसलिए हम कह देते हैं कि वेद भगवान ने बनाये है। बनाए वनाए नहीं है वो तो सनातन है।
—जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज
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कलियुग में दान को ही कल्याण का एकमात्र माध्यम बताया गया है। 'दानमेकं कलौयुगे'।
दान पात्र के अनुसार ही अपना फल देता है तथा भगवान एवं महापुरुष के निमित्त किया गया दान सर्वोत्कृष्ट फल प्रदान करता है।
हम साधारण जीव यथार्थ में यह नहीं जान सकते कि वास्तविक महापुरुष के प्रति किया गया हमारा दान/समर्पण हमारे कल्याण का कैसा अद्भुत द्वार खोल देगा। अतएव, समर्पण हेतु आगे बढिये।
आपकी यह दान राशी जीरकपुर (चंडीगढ़) स्थित राधा गोविंद मन्दिर के निर्माण कार्य में प्रयुक्त होगी।
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