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अभिज्ञानशाकुन्तलम् वाचन || चतुर्थ अंक || {अंक के 22 श्लोको का वाचन भरतवाक्य के साथ} ||Prachi Dwivedi

Автор: संस्कृत संगम

Загружено: 2023-03-13

Просмотров: 63552

Описание: #tgtsanskrit #pgtsanskrit #sanskrit #abhigyan_shakuntalam

अभिज्ञानशाकुन्तलम् का मङ्गलाचरण:-
"या सृष्टि: स्त्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री
ये द्वे कालं विधत्त: श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य प्राणवन्त:
प्रत्यक्षाभि: प्रपन्नोस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीश: ॥१॥ (स्रग्धरा)

विचिन्तयनती यमनन्यमानसा
तपोधनं वेत्सि न मामुपस्थितम्।
स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन्
कथां प्रमत्त: प्रथमं कृतामिव ॥२॥ (वंशस्थ)

यात्येकतोऽस्तशिखरं पतिरोषधीनाम्
आविष्कृतोऽरुणपुर: कस एकतोऽर्क:।
तोजोद्वयस्य युगपद्व्यसनोदयाभ्यां
लोको नियम्यत इवात्मदशान्तरेषु ॥२॥ (वसन्तलिका)

अन्तर्हिते शशिनि सैव कुमुद्वती मे
दृष्टिं न नन्दयति संस्मरणीयशोभा।
इष्टप्रवासजनितान्यबलाजनस्य
दु:खानि नुनमतिमात्रसुदु:सहानि ॥३॥ (वसन्तलिका)

दुष्यनतेनाहितं तेजो दधानां भूतये भुव:।
अवेहि तनयां ब्रह्मान्नग्निगर्भा शमीमिव ॥४॥ (अनुष्टुप)

क्षौमं केनचिदिन्दुपाण्डु तरुणा माङ्गल्यमाविष्कृतं
निष्ठयूतश्चरणोपरागसुभगो लाक्षारस: केनचित्।
अनयेभ्यो वनदेवताकरतलैरापर्वभागोत्थितै -
र्दत्तान्याभरणानि न: किसलयोद्भेदप्रतिद्वन्द्विभि: ॥५॥ (शार्दूलविक्रीडित)

यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्ठमुत्कण्ठया
कण्ठ: स्तम्भितबाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्।
वैक्लव्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहाद्रणयौकस:
पीड्यन्ते गृहिण: कथं नु तनयाविश्लेषदु:खैर्नवै: ॥६॥ (शार्दूलविक्रीडित)

ययातेरिव शर्मिष्ठा भर्तुर्बहुमता भव।
सुतं त्वमपि सम्राजं सेव पूरुमवाप्नुहि ॥७॥ (अनुष्टुप)

अमी वेदिं परित: क्लृप्तधिष्ण्या:
समिद्वन्त: प्रान्तसंस्तीर्णदर्भा:।
अपघ्नन्तो दुरतं हव्यगन्धै -
र्वैतानास्त्वां वह्नय: पावयन्तु ॥८॥ (वैदिक-त्रिष्टुप)

पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या
नाद्त्ते प्रियमण्जनाऽपि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्।
आद्ये व: कुसुमप्रसूतिसमये यस्या भवत्युत्सव:
सेयं याति शकुन्तला पातिगृहं सर्वैरनुज्ढायताम् ॥९॥ (शार्दुलविक्रिडित)

अनुमतमसना शकुन्तला
तरुभिरयं वनवासबनुधुभि:।
परभृतविरुतं कलं यथा
प्रतिवचनीकृतमेभिरीदृशम् ॥१०॥ (अपरवक्त्र)

रम्यान्तर: कमलिनीहरितै: सरोभि-
श्छायाद्रुमैरिनियमितार्कमयूखताप:।
भूयात् कुशेशयरजोमृदुरेणुरस्वा:
शान्तानुकूलपवनश्च शिवश्च फन्था: ॥११॥ (वसन्तलिका)

उद्गलितदर्भकवला मृग्य: परित्यक्तनर्तना मयूरा:।
अपसूतपाण्डुपन्ना मुञ्चन्त्यश्रूणीव लता: ॥१२॥ (आर्या)

संकल्पितं प्रथममेव मया तवार्थे
भर्तारमात्मसदृशं सुकृतैर्गता त्वम्।
चूतेन संश्रितवती नवमालिकेयम्
अस्यामई त्वयि च सम्प्रति वीतचिन्त: ॥१३॥ (वसन्तलिका)

यस्य त्वया व्रणविरोपणमिङ्गुदीनां
तैलं न्यष्च्यत मुखे कुशसूचिविद्धे।
श्यामाकमुष्टिपरिवर्धितको जहाति
सोऽयं न पुत्रकृतक: पद्वीं मृगस्ते ॥१४॥ (वसन्तलिका)

उत्पक्ष्मणोर्नयनयोरुपरुद्धवृत्तिं
बाष्पं कुरु स्थिरतया विरतानुबन्धम्।
अस्मिन्नलक्षितनतोन्नतभूमिभागे
मार्गे पदानि खलु ते विषमीभवन्ति ॥१५॥ (वसन्तलिका)

एषापि प्रियेण विना गमयति रजनीं विषाद्दीर्धतराम्।
गुर्वपि विरहदु:खमाशाबन्ध: साहयति ॥१६॥ (आर्या)

अस्मान् साधु विचिन्त्य संयमधनानच्चै: कुलं चात्मन-
स्त्वय्यस्या: क्थमप्यबान्धवकृतां स्नेहप्रवृत्तिं च ताम्।
सामान्यप्रतिपत्तिपूर्वकमियं दारेषु दृश्या त्वया
भाग्यायत्तमत: परं न खलु तद् वाच्यं वधूबन्धुभि: ॥१७॥ (शार्दूलविक्रिडित)

शुश्रूषस्व गुरून् कुरु प्रियसखीवृत्तिं सपत्नीजने
भर्तुर्विप्रकृताऽपि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गम:।
भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने भाग्येष्वनुत्सेकिनी
यान्तेवं गृहिणीपदं युवतयो वामा: कुलस्याधय: ॥१८॥ (शार्दूलविक्रिडित)

अभिजनवतो भर्तु: श्लाधये स्थिता गृहिणीपदे
विभवगुरुभि: कृत्यैस्तस्य प्रतिक्षणसाकुला।
तनयमचिरात् प्राचीवार्कं प्रसूय च पावनं
मम विरहजां न त्वं वत्से शुचं गणयिष्यसि ॥१९॥ (हरिणी)

भूत्वा चिराय चतुरन्तमहीसपत्नी
दौष्यन्तिमप्रतिरथं तनयं निवेश्य।
भर्त्रा तदर्पितकुटुम्बभरेण कार्धं
शान्ते करिष्यसि पदं पुनराश्रमेऽस्मिन् ॥२०॥ (वसन्तलिका)

शममेष्यति मम शोक: कथं न वत्से त्वया रचितपूर्वम्।
उटजद्वाविरूढं नीवारबलिं विलोकयत: ॥२१॥ (आर्या)

अर्थो हि क्या परकीय एव
तामद्य संप्रेष्य परिग्रहीतु:।
जातो ममायं विशद: प्रकामं
प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा॥२२॥ (इन्द्रवज्रा)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् का भरतवाक्य:-

प्रवर्ततां प्रकृतिहिताय पार्थिव:
सरस्वती श्रुतमहतां सहीयताम्।
मामपि च क्षपयतु नीललोहित:
पुनर्भवं परिगतशक्तिरात्मभू: ।। (रुचिरा)


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