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अभिज्ञानशाकुन्तलम् वाचन || प्रथम अंक || {अंक के 34 श्लोकों का वाचन }

Автор: संस्कृत संगम

Загружено: 2023-09-15

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Описание: #vachan #sanskrit #abhigyan_shakuntalam#tgt #pgt #ugc#net#jrf #emrs#bpsc#kvs#tet#supertet#ctet

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या सृष्टि: स्त्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री
ये द्वे कालं विधत्त: श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्
यामाहु सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्त:
प्रत्यक्षाभि: प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीश:


आ परितोषाद विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम् ।
बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेत: ।।2।।

सुभगसलिलावगाहा: पाटलसंसर्गसुरभिवनवाता: ।
प्रच्छायसुलभनिद्रा दिवसा: परिणामरमणीया: ।।3।।

ईषदीषच्चुम्बितोनि भ्रमरे: सुकुमारकेसरशिखानि ।
अवतंसयन्ति दयमाना: प्रमदा: शिरीषकुसुमानि ।।4।।

तवास्मि गोतरागेण हर्मरणा प्रसभं हुत: ।
एव राजेव दुष्यंन्त: सारङ्गाणातिरहसा ।।5।।

कृष्णासारे ददच्चक्षुस्त्वयि चधिज्यकार्मुके।
मृगानुसारिणं साक्षात् पश्यामीव पिताकिनम् ।।6।।

ग्रीवाभङ्गाभिरामं मुहुरनुपतति स्यन्दने दत्तदृष्टि:
पश्चार्धन प्रविष्ट: शरपतनभयाद् भूयसा पूर्वकायम ।
दभेरर्धावलीढै: श्रमविवृतमुखभ्रंशिभि: कीर्णवर्त्मा
पश्योदग्रप्लुतत्वाद् वियति बहुतरं स्तोकमुर्व्यां प्रयाति ।।7।।

सुक्तेषु रश्मिषु निरायतपूर्वकाया।
निष्कम्पचामरशिखा निभूतोर्धवकर्णा
आत्मोद्धतैरपि रजोभिरलङ्घनोया
धावन्त्यमो मृगजवाक्षमयैव रथ्या: ।।8।।

यदालोके सूक्ष्मं व्रजति सहसा तद् विपुलतां
यदद्धा विच्छिन्नं भवति कृतसन्धानमिव तत् ।
प्रकृत्या यद् वऋं तदपि समरेखं नयनयो-
र्न मे दूरे किंचित् क्षणमपि न पार्श्वे रथजवात् ।।9।।

न खलु न खलु बाण: सन्निपात्यो...यमस्मिन्
मृदुनि मृगशरीरे पुष्परणाविवाग्नि: ।
क्व बल हरिणकानां जीवितं चातिलोलं
क्व च निशितनिपाता वज्रसारा: शरास्ते ।।10।।

तत् साधुकृतसन्धानं प्रतिसंहर सायकम्।
आर्तत्राणाय व: शस्त्रं न प्रहर्तुमनागसि ।।11।।

जन्म यस्य पुरेर्वशे युक्तरूपमिदं तव ।
पुत्रमेवंगुशोपेतं चऋवतिनमाप्नुहि ।।12।।

समवलोक्य। क्ररिया♣म्यास्तपोधनानां प्रतिहतविघ्ना
ज्ञास्यसि कियद् भुजो मे रक्षति मौर्वोकिणाङ्क इति ।।13।।

नीवारा: शुकगर्भकोटरमुख भ्रष्टास्तरूणामध:
प्रस्निग्धा: क्वचिविङ्गदीफलभिद: सूच्यन्त एवोपला: ।
विश्वासोपगमादभिन्नगतय: शब्दं सहन्ते मृगा-
स्तोयाधारपधाश्च वल्कलशिखानिष्यन्दरेखाङ्किता: ।।14।।

कुल्याम्भोभि: पवनचपलै: शाखितो धौतमूला
भिन्नो राग: किसलयरुचामाज्यधूमोद्गमेन ।
एते चार्वागुपवनभुवि च्छिन्नदर्भाकुरायां
नष्टाशंका हरिणशिशवो मन्दमन्दं चरन्ति ।।15।।

शान्तमिदमाश्रमपदं स्फुरति च बाहु: कुत: फलमिहास्य ।
अथवा भवितव्यानां द्वराणि भवन्ति सर्वत्र ।।16।।

शुद्धान्तदुर्लभमिदं वपुराश्रमवासिनो यदि जनस्य ।
दूरीकृता: खलु गुणैरुद्यानलता वनलताभि: ।।17।।

इदं किलाव्याजमनोहरं वपु-
स्तप:क्षमं साधयितुं य इच्छति ।
ध्रुवं स लीलोत्पलपत्रधारया
शमीलतां थोत्तुमृषिर्व्यवस्यति ।।18।।

इदमुपहितसूक्ष्मग्रन्थिना स्कन्धदेशे
स्तनयुगपरिणाहाच्छादिना वल्कलेन ।
वपुरभिनवमस्या: पुष्यति स्वां न शोभां
कुसुममिव पिनद्धं पाण्डुपत्रोदरेण ।19।

सरसिजमनविद्धं शैवलेनापि रमयं
मलिनमपि हिमांशोर्लक्षम लक्ष्मीं तनोति ।
इयमधइकमलोज्ञा वल्कलेनापि लन्वी
किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् ।।20।।

अधर: किसलयराग: कोमलविटापानुकारिणौ बाहू ।
कुसुममिव लोभनीयं यौवनमङ्गेषु सन्नद्धम् ।।21।।

असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा
यदार्यमस्यामभिलाषि मे मन: ।
सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु
प्रमाणमन्त:करणप्रवृत्तय: ।।22।।

यतो यत: षट्चरणो..भिवर्तते
ततस्तत: प्रेरितवामलोचना ।
विवर्तितभ्रूरियमद्य शिक्षते
भयादकामा...पि हि दृष्टिविभ्रमम् ।।23।।

चलापाङ्गा दृष्टिं स्पृशसि बहुशो वेपथुमतीं
रहस्याख्यायीव स्वनसि मृदु कर्णान्तिकचर: ।
करौ व्याधुन्वत्या: पिबसि रतिसर्वस्वमधरं
वयं तत्त्वान्वेषान्मधुकर हतास्त्व खलु कृतौ ।।24।।

क: पौरवे वसुमतीं शासति शासितरि दुर्विनीतानाम् ।
अयमाचरत्यविनयं मुग्धासु तपस्विकन्यासु ।।25।।

मानुषीषु कथं वा स्यादस्य रूपस्य संभव:
न प्रभातरलं ज्योतिरुदेति वसुधातलात् ।।26।।

वैखानसं किमनया व्रतमा प्रदानाद्
व्यापाररोधि मदनस्य निषेैवितव्यम् ।
अत्यन्तमेव सदृशेक्षणवल्लभाभिृ
राहो निवत्स्यति समं हरिणाङ्गनाभि: ।।27।।

भव हृदय साभिलावं सम्प्रति सन्देहनिर्णयो जात: ।
आशङ्कसे यदग्निं तदिदं स्पर्शक्षमं रत्नम् ।।28।।

अनुयास्यन् मुनितनयां सहसा विनयेन वारितप्रसर: ।
स्थानादनुच्चलन्नपि गत्वेव पुन: प्रतिनिवृत्त: ।।29।।

स्तरस्तांसावतिमात्रलोहिततलौ बाहू घटोत्क्षेपणाद्
अद्यापि स्तनवेपथुं जनयति श्वास: प्रमाणाधिक: ।
बद्धं कर्णशिरीषरोधि वदने धर्माम्भसां जालकं
बन्धे स्रंसिनि वैकहस्तयमितां पर्याकुला मूर्धजा: ।।30।।

वाचं न मिश्रयति यद्यपि मद्वचोभि:
कर्णं ददात्यभिमुख्ं मयि भावमाणे ।
कामं न तिष्ठति मदाननसम्मुखीना
भूयिष्ठमन्यविषया न तु दृष्

तुरगखुरहतस्तथा हि रेणु-
विटपविषक्तजलार्द्रवल्कलेषु ।
पतति परिणतारुणप्रकाश:
शलभसमूह इवाश्रमद्रुमेषु ।।32।।

तीव्राधातप्रतिहततरुस्कन्धलग्नैकदन्त:
पादाकृश्टव्रततिवलयासङ्गसंजातपाण: ।
मूर्तो विघ्नस्तपस इव नो भिन्नसारङ्गयूथो
धर्मारण्यं प्रविशति गज: स्यन्दनालोकभीत: ।।33।।

गच्छति पुर: शरीरं धावति पश्चादसंस्तुतं चेत: ।
चीनांशुकमिव केतो: प्रतिवातं नीयमानस्य ।।34।।

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