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बुजुर्ग

Автор: PAHAD PRIME

Загружено: 2025-12-28

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Описание: रुद्रप्रयाग: उत्तराखंड की पहचान एक सुंदर पहाड़ी प्रदेश के रूप में है. हरे-भरे खेत-खलिहान, पर्वत श्रृंखलाएं, प्राकृतिक सौंदर्य यहां की पहचान हैं. लेकिन राज्य अस्तित्व में आने के बाद इन 25 सालों में पलायन की मार झेल रहे कई गांव खाली हो चुके हैं. कभी लोगों से गुलजार रहने वाले गांवों को 'घोस्ट विलेज' कहा जाने लगा है. ऐसे ही गांवों की श्रेणी में उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिला का ल्वेगढ़ गांव भी शामिल हो गया है. ये गांव गढ़वाल के 52 गढ़ों में शामिल है.

उत्तराखंड के पहाड़ उजड़ने के पीछे कई वजहें रही हैं. हालांकि, गांव के गांव खाली होने का मुख्य कारण बुनियादों सुविधाओं का अभाव रहा है, जिसकी बानगी हर गांव में देखने को मिल जाती है. रुद्रप्रयाग जिले का ल्वेगढ़ गांव भी ऐसी परिस्थितियों से लड़कर अब हार गया है और अब ये गांव भी वीरान हो गया है।

दरअसल, ल्वेगढ़ गांव में अंतिम निवासी 90 वर्षीय सीता देवी के निधन के बाद शेष दो बुजुर्ग महिलाएं भी ये गांव छोड़कर अपने परिजनों के पास अन्य गांवों में चली गईं, जिससे यह गांव खाली हो गया. स्वतंत्रता सेनानी शिव सिंह सजवाण का पैतृक गांव आज बुनियादी सुविधाओं के अभाव में वीरान हो गया है।
जहां एक ओर सरकार रिवर्स पलायन की बात कर रही है, वहीं जमीनी हकीकत ठीक उलट दिखाई दे रही है. पहाड़ों में मूलभूत सुविधाओं के अभाव में पलायन तेजी से बढ़ा है. गांवों में अब वीरानी छाने से जंगली जानवरों का आशियाना बनते जा रहे हैं. सरकार और प्रशासन समय रहते अगर इन गांवों में ध्यान देता तो आज स्थिति ऐसी नहीं होती।

रुद्रप्रयाग जिला में स्थित स्वतंत्रता सेनानी शिव सिंह सजवाण का पैतृक गांव ल्वेगढ़ अब पूरी तरह खाली हो चुका है. गांव की अंतिम निवासी 90 वर्षीय सीता देवी के निधन के बाद शेष दो बुजुर्ग महिलाएं भी अपने परिजनों के पास अन्य गांवों में चले गए हैं, जिससे यह गांव जनशून्य हो चुका है. गांव के खाली होने का मुख्य कारण सड़क और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव रहा है।

वैसे पहाड़ी इलाकों के सैकड़ों गांव सड़क, पानी, स्वास्थ्य और संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में खाली रहे हैं. रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि ब्लॉक की ग्राम पंचायत कांडई का राजस्व गांव ल्वेगढ़ इन्हीं में से एक है. ये वही गांव है, जहां के स्वतंत्रता सेनानी शिव सिंह सजवाण ने आजादी की लड़ाई में कई बार जेल की सजा काटी थी. जिस गांव से कभी आजादी की मशाल जली थी, आज वहां वीरानी और सन्नाटा पसरा हुआ है. इसी गांव से कुछ दूरी पर स्थित ढिंगणी गांव भी चार साल पहले जनशून्य हो चुका है, जबकि चाम्यूं गांव में केवल एक बुजुर्ग दंपति रह रहे हैं। मूलभूत सुविधाएं ना होने से हुआ पलायन: बता दें कि करीब दस साल पहले तक ल्वेगढ़ में 15 परिवार निवास करते थे. पेयजल, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं न मिलने के कारण लोग धीरे-धीरे पलायन करने लगे. आज गांव तक पहुंचने के लिए एक किमी पैदल रास्ता भी मुश्किल से दिखाई देता है. गांव के चारों ओर बड़ी-बड़ी झाड़ियां उग गई हैं और कई आशियानें टूट चुके हैं।

इस वर्ष अक्टूबर के पहले हफ्ते तक गांव में केवल तीन बुजुर्ग महिलाएं और एक दिव्यांग युवक ही रह रहे थे. 10 अक्टूबर को 90 वर्षीय सीता देवी का निधन हो गया. उनके दिव्यांग बेटे को यह समझ नहीं आया कि मां अब नहीं रही और वह दो दिन तक उन्हें जगाने की कोशिश करता रहा। तीसरे दिन बेटे ने पास के गांव पणधारा पहुंचकर ग्रामीणों को सूचना दी, जिसके बाद सीता देवी की मृत्यु की खबर फैली. ग्रामीणों ने पहुंचकर उनका अंतिम संस्कार किया. इसके बाद गांव में बचीं शेष दो महिलाएं भी अपने परिजनों के पास अन्य गांवों में चली गईं, अब ल्वेगढ़ में कोई भी निवासी नहीं बचा है. गांव के युवाओं को स्वतंत्रता सेनानी शिव सिंह सजवाण ने स्वावलंबन की ओर बढ़ने की सीख दी थी, लेकिन विडंबना देखिए सरकार और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता से गांव विकास से अछूता रह गया. जिससे लोग पलायन को मजबूर हो गए।

जिम्मेदार बोले, लौटेंगे ग्रामीण तो होगा विकास,,

कितनी सरकारें आई और गईं लेकिन कोई भी इस पलायन की समस्या से पार नहीं पा सका. वहीं, खाली हुए इस गांव को लेकर विधायक भरत सिंह चौधरी से बात हुई तो उनका कहना है कि गांवों के इस तरह खाली होने के कारण वहां के लिए योजनाएं नहीं बन पा रही हैं. विधायक का कहना है कि अगर कोई गांव में वापस आता है, तो सुविधाएं दी जाएंगी.

ये गांव का नाम उत्तराखंड के 52 गढ़ों में गिना जाता है. ल्वेगढ़ से कभी हुकूमत चली, वही गांव आज वीरानी में डूब गया है. बता दें कि, प्राचीन समय में इसी गांव को लोइगढ़ के नाम से जाना जाता था।

पलायन आयोग की रिपोर्ट:

गौर हो कि प्रदेश में साल 2017 में बीजेपी की सरकार बनने के बाद पलायन के कारणों और रोकथाम के लिए ग्राम्य विकास विभाग के अंतर्गत पलायन आयोग गठित किया गया. पलायन के संदर्भ में आयोग ने उत्तराखंड के सभी गांवों का सर्वे किया और टीम ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, जिसमें पलायन की वजह स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार प्रमुख कारण बनकर सामने आए थे.


हैरानी की बात ये है कि जिन पहाड़ों को सुरक्षित रखने के मकसद से अलग उत्तराखंड राज्य बनाया गया था, वहां राज्य गठन के बाद लगभग 60 प्रतिशत आबादी यानी 32 लाख लोग अपना घर छोड़ चुके हैं. पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2018 में प्रदेश के 1,700 गांव वीरान हो चुके हैं. वहीं प्रदेश में एक हजार गांव ऐसे हैं, जहां 100 से कम लोग बचे हैं. रिपोर्ट के अनुसार कुल 3900 गांवों से पलायन हुआ।
#palayan #uttarakhand #pahadprime

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