भेष दरियाव में हंस भी होत है
Автор: कबीर वाणी
Загружено: 2026-02-05
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भेष दरियाव में हंस भी होत है,।।2।।
भेष दरियाव में बाग होई। भेष
दरियाव में रत्न भी होत है,।।2।।
भेष दरियाव में संख होई।
जीवत मरी बिना भेद पावै नहीं,।।2।।
कहिन कबीर गुरुदेव के ज्ञान से।
आया यहाँ पद चीना नहीं,।।2।।
रहता जगत में अभिमान से।
साँचे औ झूठ की तान कैसे मिले,।।2।।
रेन औ डे का फेर भाई।
लोन और सरकार एक सी होत है।।2।।
कालपी जाट का लोन पाई।
हंस और बैग तो एक से होत हैं,।।2।।
भच्छ में होत कछु फेर भाई।
कहें कबीर तो हंस मुक्ता चुनो,।।2।।
बग्ग तो माछरी खोजी कूं।
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