भागो मत जरे, तेरी काया में गुलजारे।
Автор: कबीर वाणी
Загружено: 2026-02-09
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भागो मत जरे, तेरी काया में गुलजारे।।2।।
करि क्यारी बोय के, रहनि राखु रखवारे।।2।।
कपाट को काग उड़ाय के, देखो अजब बहारे। 1
भागो मत जरे, तेरी काया में गुलजारे।।2।।
मन माली को तारी कै, करि संयम की बात।।2।।
दया वृक्ष देखो नहीं, सींच क्षमा जल धारे। 2
भागो मत जरे, तेरी काया में गुलजारे।।2।।
गुलक्यारी के बीच में, फूल रहे कचनारे।।2।।
खिले गुलाब अजब रंग, गुल गुलाब की डारे। 3
भागो मत जरे, तेरी काया में गुलजारे।।2।।
अष्ट कष्ट से होत, लीला अगम अपारे।।2।।
कहें कबीर चित चेत के, पूर्व संध्या विचारे। 4
भागो मत जरे, तेरी काया में गुलजारे
भागो मत जरे, तेरी काया में गुलजारे।।2।।
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