क्या इसलिये हमारी स्थीती चिंतनिय बनी है? (प्रतिकों का संहार )
Автор: Awachitrao Sayam Gond
Загружено: 2020-09-13
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धनवंत धनितर बैगा गुनिया और प्रतिक व्यवस्था :-
सईमाल गुट्टाकोर के पसारुकोट के निवासी रहे है.मुलासंभु के पट्टशिष्य रहे है.
पहांदी पारी कुपार लिंगोजी के तंदरी विद्या के द्वारा उन्होंने जान लिया था की कोयामुरी के चारों संभागों पर कौनसे धातु, वनस्पती, जीव जंतु,पशु पक्षी मौजुद है. उस नुसार जडीबुटीयों के धातुवों के जीव जंतुवों के विषयतज्ञ धनवंत धनित्तर बैगा की सहायता से सभी उपयुक्त वनस्पती ,पशु, पक्षी, जीव जंतुवों की सुची बनाई
और उन्हीं के नामों नुसार उन्होंने कोयावंशियों के गोत्र नामो की सुची बनाकर कोयावंशियों को 750 गोत्रों को आंबटीत किये. और हरेक गोत्र को 3 गोत्र प्रतिके बहाल किये.
उससे इस पुकराल जगत की कुल 2250 प्रतिकों के रुप में वनस्पती,पशु, पक्षी ,जीव-जंतुवों का संरक्षण होता है.हर एक गोत्र ने उन्हें आंबटित हुये प्रतिकों का याने एक झाड, एक पक्षी, एक प्राणी का संरक्षण करना है और दुसरे गोत्र ने उनका संहार करना है.
संरक्षण और संहार इस निती से ही प्रकृती मे संतुलन बना रहता है .
प्रकृती के संतुलन पर ही हमारे गोत्र प्रतिकों के चिंतन सार गर्भीत है .
स्पष्टत: इसी मुलभुत जीवन दर्शन पर ही आधारीत है हमारे गोत्र और गोत्र प्रतिक .
जमीन पर जो भी पेड- पौधे ,जडी-बुटी, कांदा- कुसा, लता वेली, सब्जी भाजी ,फुल-पत्ती, घास- फुस ,गरम मसाला ,फल अन्न,पशु-पक्षी ,जीव- जंतु पाये जाते है उन्हें मानव और प्राणी खाते है.
अंतत: उनके संपूर्ण शरीरांग के साथ रक्त मे भी उस धातु के जीवन तत्व भरे रहते है.जो सुर्य उर्जा द्वारा जमीन के धातुतत्व मे उर्जीत उर्जा को वनस्पती की मुलों द्वारा सिंचित कर उस से वनस्पती से निर्मीत अन्न को मानव और पशु सेवन करते है .
जो पंचतत्व का यौगीक शक्ती युक्त धातुतत्व भी है. वही सप्तक धातुतत्व भी है. वही मुलशक्ती पुंज भी है. वही माटीतत्व भी है .वही घाटीतत्व भी है. वही गोत्रतत्व भी है.वही बिजतत्व भी है .वही कोयतुर है. उसके साथ ही रिस्ता जुटता है गोंडवाना का .
अलग अलग भूखंड पर पाये जानेवाले धातुतत्व को वहां की वनस्पती द्वारा निर्मीत अन्न का सेवन करने से वहां के धातुतत्व वहां के भूखंड निवासी के रक्त मे जाते है उस से उनका बिजतत्व बनता है .कोयतुर वंश के गढखुट शक्तीशाली संपन्न बने.जो शक्ती संपन्न सगा सोयरा का धृवीय तत्व के साथ रिस्ता बनें इसलिये सम- विषम पारी विवाह निती बनाई गयी है.
ध्यान रहे केवल गोत्र अलग -अलग होणे से शादीनही होती.गोत्र के जडतक याने धातुतत्व जाना अती आवश्यक है.और उसे लिंगोजी ने महान तंदरी विद्या नुसा रसम विषम पारी निती को बनाकर दिया है.
गोत्र प्रतिक तीन मुलतत्व ज्ञानदिप बनकर आगे चलते रहे ताकी पृथ्वी पर प्रकृती मे संतुलन बना रहे .
चिंतनिय :-
हमने हमारे गोत्र प्रतिकों को भुला दिया है. उनकी सही जाणकारी नही होणे से वे हमारे गोत्र के लिये पुज्यनिय होकर भी उनके संरक्षण की जिम्मेदारी हमारे गोत्र पर होकर भी, हमने संरक्षण के बजाय उनका संहार करना शुरु किया .उन्हें मारना- काटना सेवन करना शुरु किया. इस से हमारे पेन पुरखां नाराज होणे से और दिन ब दिन हमारी गोंडी संस्कृती को हम गोंडीयनों द्वारा नजरअंदाज करने से और रस्म रिवाजों की अनदेखी करने से आज हमारी यह बेबस और दयनिय स्थिती बनी हुई है .इस पर चिंतन की आवश्यकता है .
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