(भाग 11) गोंडी गोत्र प्रतिके (TOTEMS) | Gondi Pratiko ke naam | Gondi gatha | Gondi katha | gond
Автор: Awachitrao Sayam Gond
Загружено: 2020-12-27
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पुकराल जगत वस्तुनिष्ठ है ,वह भुतकाल मे भी था और भविष्य काल मे भी रहेगा .उसका अस्तित्व किसी के भी अनुभव पर आधारीत नही है.
सत्य का स्वरुप सत्यनिष्ट रहा है.भौतिक जगत का ज्ञान पंचंद्रियों के अनुभव से ही होता है.पंचंद्रियें ही यथार्थ ज्ञान के एकमात्र साधन रहे है.पंचंद्रियो के माध्यम से ही प्रत्यक्ष जगत के हम ज्ञान योगचक्र रहे है.
बौद्धिक शक्ति से ही प्रकृती के नियमों का सत्यज्ञान मानव समाज को हो सकता है .सतत प्रयासों से ही ,हो सकता है. ज्ञान विज्ञान से ही, हो सकता है .
सृष्टी ऐसी अजीबों गरीब है, की उसे एक बार देखकर उस के शक्तियों को कोई समझ नही सकता.मानव अपने ज्ञानेंद्रियों के बल पर जैसे- जैसे सृष्टी के शक्तियों से परीचित हो जाता है वैसे- वैसे उस के प्रकृती शक्तियों के साथ संबंध बढते जाते है .निरंतर प्रयास उस के गुढ रहस्यों को भी उजागर करते जाते है .
पंचंद्रियों मे आंख जीभ, नाक ,त्वचा और कान आते है,जिस से कस रस ,मोवक, इटलेंग अर्थात रुप ,रस,गंध, स्पर्श ,शब्द ही तमपेनी- आशक्ती को मन बुध्दी सृजन करते जाते है .
अंतत: सत्यानुभुती को ही संयमीत करना हमारा गुरुत्व रहा है . हमारा पुनेम दर्शन रहा है .
सगावेन घटक हमारे कोयतुर वंश को स्पष्ट उजागर करते है
गोंडवाना भूखंड हमारे कोयामुरी द्विप को सुस्पष्ट उजागर करता है .
कोयामुरी के अवतरीत आदीदेवी-देवता मुलासंभु रहे है.
धनवंत धनीत्तर बैगा गुणीया रहे है .
धर्ममाय जंगो क्रांतीदुत रही है.
धर्मगुरु लिंगो शांतीदुत रहे है.
सगामाय कंकाली ममत्वदुत रही है .
ऐसे गरीमामय व्यक्तीत्व के विषयों मे हमें प्रकाश डालना आवश्यक है ,निरंतर शोध अभ्यास की जरुरत है.
पंचंद्रियो के द्वारा गोंडी पुनेम की वास्तविकता जाणना और मानणा आवश्यक है .गोंडी पुनेम का प्रचार एंव प्रसार तथा गहराई से लिखाण एंव बखाण आवश्यक है. जीन- जीन महानुभाव सगाजीवों ने पुनेम का लिखाण किया है, उन्हे संपूर्ण कोया समाज नतमस्तक होता है, सेवा जोहार जय सेवा करता है .
अवचितवाणी इस शृंखला के द्वारा हम गोंडी गाथा ,कोया गाथा ,गोंड गोंडी गोंडवाना की गाथा सुनाने का प्रयास कर रहे है .
हमने आज तक पहांदी पारी कुपार लिंगो ,माता जंगो रायतार ,माता कली कंकाली ,हिरासुका पाटालीर और संभु शेक एंव धनवंत धनित्तर बैगा की विस्तृत जाणकारी दि है.
हमने गोंड सगा समाज के गोत्र और उनके गोत्र प्रतिकों के बारें मे बताया है गोंड सगा समाज के गोत्र सामान्यतः पेड- पौधे ,पशु- पक्षी,लता- वेली ,फुल- पत्ते ,फल- बीज , जीव- जंतु,भुचर- जलचर, किटक - जंतु इनके नामों पर संरचीत है.
जिन के गोत्र नामों का अंत्य अक्षर :-
" म "है उनका गोत्र मडा याने पेड पौधे होता है.
" याम " है उनका गोत्र पन्नेर याने पशु, प्राणी, पक्षी होता है
" पा" है उनका गोत्र पाल याने किसी भी पेड या पशु का दुध होता है .
" मी " है उन का गोत्र मीन याने मछली होता है .
" वी " है उन का गोत्र वेली याने किसी भी प्रकार की लता या वेली होता है .
" ची " है उन का गोत्र का आची या आकी याने किसी भी पेड ,लता वेली की पत्ती या पान होता है .
"ती " है उन का गोत्र तीली याने किसी भी प्रकार का किटक होता है .
" का " है उन का गोत्र काल याने कौन से प्राणी या पशु का पंजा होता है.
" मेंता " है उन का गोत्र मेंता याने मईंता होता है याने विचरणा ऐसा अर्थ अभिप्रेत होता है .
आज बहुत सारे गोंड सगा साथियों को अपने गोत्र एंव उन के प्रतिकों के बारें मे जाणकारी नही है . कुल 12 सगादेवों में 750 गोत्र होते है और हर एक गोत्र को तीन प्रतिके याने एक झाड ,एक पशु ,एक पक्षी नुसार कुल 2250 प्रतिके आंबटीत किये है इन सभी की जाणकारी गोंडी गाथा ,कोया गाथा और गोंड गोंडी गोंडवाना की गाथा नुसार देणे का हमारा प्रयास है .
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