प्यार करो… लेकिन बचाओ मत | Real Parenting| Parvarish | Parenting Truth
Автор: satendar shekhawat
Загружено: 2026-01-05
Просмотров: 29
Описание:
नमस्कार दोस्तों, मैं हूँ शेखावत… और मैं कहानी नहीं, इमोशन लिखता हूँ।
इस वीडियो में बात है असली पेरेंटिंग की —
उस प्यार की, जो बच्चे को बचाने नहीं… बल्कि मजबूत बनाता है।
आज हम जानेंगे:
✔ बच्चे को असफलता से निपटना कैसे सिखाएँ
✔ जिम्मेदारी देने के सही तरीके
✔ ‘ना’ सुनने की आदत क्यों जरूरी है
✔ पॉकेट मनी से पैसे की समझ
✔ छोटे-छोटे अनुभव जो बच्चे का आत्मविश्वास बनाते हैं
✔ माता-पिता का सही रोल — Coach, not Savior
✔ 3–21 साल तक बच्चों के लिए सही जिम्मेदारियाँ
अगर आप माता-पिता हैं या किसी बच्चे को गाइड करते हैं,
तो ये वीडियो आपके लिए जीवन बदलने वाला हो सकता है।
अगर ये बातें अच्छी लगीं तो वीडियो को Share, Like और Subscribe ज़रूर करें।
आपका सपोर्ट ही मुझे आगे बढ़ने की हिम्मत देता है।
Thank you ❤️
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सोचा है...
एक बच्चा दुनिया में आने के बाद सीखता नहीं,
बल्कि सबसे ज़्यादा सिखाया जाता है।
हर कोई उसे बताता है —
“ऐसा मत कर, ये बुरा है”, “वैसा कर, वो अच्छा है”...
पर किसी ने ये नहीं बताया कि — अच्छा-बुरा हर किसी के लिए अलग होता है।
नमस्कार दोस्तों,
मैं हूँ शेखावत,
और मैं कहानी नहीं,
इमोशन लिखता हूँ।
सुनो भाई,
प्यार देना बहुत ज़रूरी है,
पर प्यार का मतलब हर मुश्किल से बचाना नहीं होता।
प्यार का मतलब है, रास्ता दिखाना,
हिम्मत देना,
और जिम्मेदारी सिखाना।
जब तुम हर छोटी चीज़ उसके लिए कर देते हो,
जैसे चप्पल पहनाना,
बैग संभालना,
या मोल-भाव कराना,
तो तुम उसका अनुभव छीन रहे हो।
और अनुभव के बिना,
बच्चा कभी खुद पर भरोसा करना नहीं सीख पाता।
दूसरी बात, ‘ना’ सुनना सिखाओ।
अगर हमेशा “हाँ” मिले,
तो वह असफलता से डरने लगता है।
दुनिया में बहुत बार “ना” मिलेगा।
जो बच्चे घर में ‘ना’ सहना सीखते हैं,
वे बाहर भी ठोकर खाने के बाद उठ जाते हैं।
तीसरी बात, छोटे-छोटे काम जिम्मेदारी सिखाते हैं।
कमरा खुद संभालना,
अपनी रोटी खुद निकालना,
छोटी खरीदारी करना —
ये सब बच्चे को निर्णय लेने की आदत देते हैं।
चौथी बात, बच्चे को बाहर लोगों के बीच भी रखें।
दुकान भेजो, रिश्तेदारों से बात कराओ।
इससे सामाजिक भाषा आती है,
मोल-भाव आता है,
और असहमति से निपटना आता है।
पाँचवी बात, असफलताएँ जरूरी हैं।
छोटी-छोटी हार देना सिखाओ,
ताकि बड़ी हार का सामना करने की ताकत बन सके।
और असफलता पर तुरंत बचाने की आदत मत डालो।
बोलो:
“ठीक है, अब बताओ, अगली बार कैसे करोगे?”
छठा, पैसों की समझ छोटी उम्र से दो।
पॉकेट मनी दो,
और खर्च-बचत का हिसाब लिखवाओ।
पैसा सिर्फ़ लेन-देन नहीं सिखाता,
बल्कि प्राथमिकता और संतुलन भी सिखाता है।
सातवीं बात, सामाजिक स्किल्स सिखाओ।
किसी से बात करना,
नम्रता,
और अपनी बात कहना — ये सिर्फ़ अनुभव से आता है।
आठवीं बात, आत्मसम्मान और आत्मविश्वास अलग चीज़ें हैं।
हर बार झूठी तारीफ़ मत करो।
सच्ची तारीफ़ कोशिश, इरादे और सुधार पर होनी चाहिए।
नौवीं बात, स्वतंत्रता देना सीखो।
उम्र के हिसाब से जिम्मेदारी दो।
3–6 साल: छोटे निर्णय
7–12 साल: छोटी खरीदारी
13–16 साल: पैसे संभालना
17–21 साल: छोटे नेतृत्व कार्य
दसवीं और सबसे ज़रूरी बात:
बोलने की आदत बदलो।
“मैं तेरे लिए कर दूँगा” कहना छोड़ो।
बोलो:
“मैं तेरे साथ रहूँगा, पर तू करेगा।”
अब सही शुरुआत कैसे करें:
रोज़ाना छोटे-छोटे चैलेंज दो।
एक हफ्ते के लिए बच्चा खुद अपना बैग तैयार करे।
अगले हफ्ते उसे 50 रुपये दो और तीन चीज़ें खरीदने भेजो।
वापस आकर खर्च का हिसाब बैठाओ।
हर गलती के बाद डराने की बजाय पूछो:
“क्या हुआ? क्या सीखा?”
अच्छा सीखने का तरीका यही है।
माँ-बाप का रोल कोच का होना चाहिए,
रिस्क्यू ऑपरेशन का नहीं।
कोच दिशा देता है, ट्रेनिंग कराता है,
और बताता है कि गलती से कैसे सुधारना है।
अपने शब्दों में कहो:
“मैं तेरे लिए नहीं करूँगा, मैं तेरे साथ करूँगा।”
समय सबसे बड़ा गुरु है।
जितनी जल्दी चुनौती देंगे,
उतना जल्दी बच्चा दुनिया के लिए तैयार होगा।
प्यार के साथ पिंजरे में मत रखो,
उड़ने की तैयारी कराओ।
बस यही तरीका है।
छोटे कदम, रोज़ अभ्यास, और धैर्य।
फर्क तुम्हें खुद दिखेगा।
धन्यवाद।
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