काम बड़ा है, हम नहीं। realistic emotional story। inspiration video। काम और घमंड कहानी
Автор: satendar shekhawat
Загружено: 2026-01-03
Просмотров: 23
Описание:
नमस्कार दोस्तों,
मैं हूँ शेखावत — और मैं कहानी नहीं, इमोशन लिखता हूँ।
आज की कहानी अहंकार, पहचान और काम की असली कीमत पर आधारित है।
बहुत बार इंसान सोचने लगता है कि वह अपने काम से बड़ा है…
लेकिन सच ये है — काम हमें बनाता है, हम काम को नहीं।
इस कहानी में एक मशहूर कारीगर की यात्रा है,
जो अपने घमंड में इतना खो गया कि वह भूल गया —
कि उसकी पहचान उसके हुनर से बनी है।
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#voiceoverstoryनमस्कार
दोस्तों,
मैं हूँ शेखावत…
और मैं कहानी नहीं — इमोशन लिखता हूँ।
आज की बात अहंकार की है।
उस अहंकार की,
जो आदमी को धीरे-धीरे इस वहम में डाल देता है
कि वो अपने काम से बड़ा है।
लेकिन सच ये है —
किसी काम को करने वाला,
कभी अपने काम से बड़ा नहीं हो सकता।
क्योंकि काम वो है
जिसने तुम्हें पहचाना दिया।
तुम्हारा नाम बनाया।
लोगों की नज़रों में जगह दी।
और तुम… बस उस रास्ते के मुसाफ़िर हो
जिसे काम ने खुद बनाया है।
कहानी सुनिए…
एक शहर में एक बहुत मशहूर कारीगर था।
लकड़ी पर नक्काशी करता था।
ऐसा काम कि जैसे लकड़ी सांस लेती हो।
लोग दूर-दूर से उसके पास ऑर्डर देने आते थे।
शुरुआत में वो बहुत विनम्र था।
कहता —
“ये हुनर मेरा नहीं…
ये लकड़ी का कमाल है।
मैं तो बस उसकी आवाज़ सुनता हूँ।”
पर समय बीता,
नाम बढ़ा…
और साथ में अहंकार भी।
अब वो कहने लगा —
“मैं जैसा काम कोई नहीं कर सकता।”
“ये शहर मेरे बिना अधूरा है।”
“लोग मेरा नाम सुनकर आर्डर लाते हैं… काम का नहीं।”
धीरे-धीरे उसने खुद को
अपने ही काम से बड़ा समझ लिया।
एक दिन उसके पास
एक बूढ़ा आदमी आया।
हाथ में एक सादा-सी लकड़ी थी।
उसने कहा —
“क्या तुम इस पर मेरी बेटी के लिए
एक छोटी-सी मूर्ति बना दोगे?”
कारीगर ने हँसकर कहा —
“इतनी छोटी-सी लकड़ी…
और ऐसा सस्ता काम?
मैं अब ऐसे काम नहीं करता।”
बूढ़ा चुपचाप चला गया।
कई महीने बीते,
काम बढ़ा, पैसा आया,
पर दिल में वो शांति नहीं थी
जो पहले उसके हाथों से निकलती थी।
एक दिन उसका शागिर्द बोला —
“उस्ताद, वो बूढ़ा याद है?
वो किसी और कारीगर के पास गया…
उसने वही लकड़ी लेकर एक मूर्ति बनाई…
और अब वही मूर्ति पूरे शहर में चर्चा का विषय है।”
कारीगर हैरान रह गया।
दिल में एक अजीब-सा दर्द उठा।
वो भागा उस जगह…
जहाँ मूर्ति रखी थी।
लोग उसे देख रहे थे,
सराह रहे थे,
तालियाँ बजा रहे थे।
पर उस मूर्ति पर किसी का नाम नहीं था।
कारीगर ने उस दूसरे कारीगर से पूछा —
“तुमने अपना नाम क्यों नहीं लिखा?”
वो मुस्कुराया और बोला —
“नाम तो वो लिखे…
जो सोचते हैं कि उन्होंने काम को बनाया है।
मैं तो जानता हूँ —
काम ने मुझे बनाया है।
मैं कैसे उससे बड़ा हो जाऊँ?”
उस दिन
उस मशहूर कारीगर की आँखें भर आईं।
उसे समझ आया —
जब इंसान को लगता है
कि उसने काम को बनाया है,
तो वहीं से उसका पतन शुरू होता है।
क्योंकि सच ये है —
काम इंसान को पहचान देता है।
काम इंसान को दुनिया में जगह देता है।
काम इंसान को सम्मान दिलाता है।
और जब इंसान ये भूल जाता है —
तो वो चमकता हुआ सूरज नहीं रहता,
वो बस धुएँ की तरह उड़ जाता है।
नमस्कार दोस्तों,
याद रखना —
काम हमसे नहीं बनता,
हम काम से बनते हैं।
जो आदमी अपने काम से ऊपर खड़ा हो जाए,
वो अपनी जड़ें काट देता है।
और जिसकी जड़ें नहीं होंगी,
वो कितनी भी ऊँचाई पर चला जाए,
गिरना तय है।
किसी काम को करने वाला
कभी अपने काम से बड़ा नहीं हो सकता।
बस यही समझ लेना…
तो ज़िंदगी में घमंड की जगह
शुक्रगुज़ार हो जाएग।
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thankyou
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