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Автор: kabir Das Bhajan
Загружено: 2026-01-30
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"ग्यानी मूल गँवाइया" संत कबीर दास जी का गहन और अत्यंत शिक्षाप्रद भजन/दोहा है। इस अमर वाणी में कबीर जी ने ज्ञान, भक्ति और गुरु की शरण का महत्व स्पष्ट किया है। वे कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति केवल ज्ञान के अहंकार में डूबा है और भक्ति का मूल (सार) खो देता है, तो उसका ज्ञान व्यर्थ है।
इस भजन का भाव है – "ग्यानी मूल गँवाइया" अर्थात जिसने भक्ति का मूल खो दिया, उसका ज्ञान भी निष्फल है। कबीर जी हमें यह सिखाते हैं कि केवल शास्त्रों का अध्ययन या बाहरी ज्ञान प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है। यदि साधक ने नाम‑स्मरण और गुरु की शरण नहीं ली, तो उसका ज्ञान उसे परमात्मा से नहीं जोड़ सकता।
🌿 भजन/दोहा का आध्यात्मिक संदेश
ज्ञान का अहंकार: केवल ज्ञान का अहंकार साधक को परमात्मा से दूर कर देता है।
भक्ति का महत्व: भक्ति ही वह मूल है जो ज्ञान को सार्थक बनाती है।
गुरु का मार्गदर्शन: गुरु ही वह शक्ति हैं जो जीव को सही मार्ग दिखाते हैं।
सच्ची साधना: नाम‑स्मरण और ध्यान ही आत्मा को शुद्ध करते हैं और परमात्मा से जोड़ते हैं।
जीवन का उद्देश्य: आत्मा को परमात्मा से जोड़ना ही साधना का सार है।
🎶 भावनात्मक प्रभाव
यह भजन सुनते समय श्रोता को गहरी आत्मिक जागृति और जीवन के सत्य की अनुभूति होती है। कबीर जी की वाणी हमें यह याद दिलाती है कि केवल ज्ञान का अहंकार व्यर्थ है। सच्चा ज्ञान वही है, जो भक्ति और गुरु की कृपा से जुड़ा हो।
🌟 निष्कर्ष
"ग्यानी मूल गँवाइया" केवल एक भजन नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन है। कबीर जी की वाणी हमें यह सिखाती है कि केवल ज्ञान का अहंकार व्यर्थ है। सच्चा ज्ञान वही है, जो भक्ति और गुरु की कृपा से जुड़ा हो। गुरु की शरण और नाम‑स्मरण ही वह मार्ग है जो जीव को सच्ची मुक्ति और शांति प्रदान करता है। यह भजन हर उस व्यक्ति के लिए है जो आत्मिक शांति, भक्ति और सत्य की खोज में है
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