अपने सुख-दु:ख का कारण दूसरों को न मानें 15 (ब) - Swami Sri Sharnanand Ji Maharaj
Автор: Swami Sharnanandji Maharaj
Загружено: 2019-01-06
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Swami Sri Sharnanand Ji Maharaj's Discourse in Hindi
स्वामी श्रीशरणानन्दजी महाराज जी का प्रवचन
देह से तादात्मय स्वीकार संकल्पों की उत्पति का कारण है। अपने सुख- दुख का कारण दूसरों को मान लेना भारी भूल है।
सुख- दुख की प्रगति के मुल में अपने देह का अभिमान हेतु है।अतः सत्संग के द्वारा इसका नाश सम्भव है।
अनुकूल- प्रतिकूल परिस्थितियां विधान से आती हैं विधान सदा ही हितकर है। अतः इसका आदर करो। सुख- दुख को साधन-सामग्री मानें तो राग- द्वेष का नाश हो जायेगा। जगत के नाते, आत्मा के नाते और प्रभु के नाते सभी को प्रेम देने की सामर्थ्य आएगी।
निराश्रय होते ही स्वाश्रय आता है, ‘स्व’ का आश्रय जीवन देने वाला है, स्वाधीनता देने वाला है, दिव्य चिन्मय जीवन से अभिन्न कर देने वाला है। इसमें हम सभी समान हैं। परिस्थितियों के आधार पर दो व्यक्ति भी समान नहीं हैं। आप मत सोचिये कि हम बड़े-बड़े साधन करेंगे तो सिद्धि मिलेगी। आप साधन का एक अंश स्वीकार करके उसको जीवन में धारण करें, सफलता अनिवार्य है।
मनुष्य का बड़ापन वस्तु, योगयता, सम्पत्ति में नहीं है। उसका बड़ापन चिरशान्ति में है, अमरत्व में है, परमप्रेम में है। सिद्धि का असली अर्थ भी यही है।
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