किये हुएकी आसक्ति हमें विश्राम नहीं देती। 23(अ) - Swami Sri Sharnanand Ji Maharaj
Автор: Swami Sharnanandji Maharaj
Загружено: 2019-01-24
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Swami Sri Sharnanand Ji Maharaj's Discourse in Hindi
स्वामी श्रीशरणानन्दजी महाराज जी का प्रवचन
सत्संग का अर्थ है-”है“ का संग, अर्थात् जो मौजूद है, विद्यमान है, प्राप्त है, उसका संग।
सत्संग के लिए आवश्यक कार्य को पूरा करना और अनावश्यक कार्य का त्याग करना अनिवार्य है।
श्रम-रहित होने पर जो आगे पीछे का, भुक्त-अभुक्त का चिन्तन होता है, उससे साधक को असहयोग करना चाहिये। किसी अन्य चिन्तन से व्यर्थ-चिन्तन का नाश नहीं होता। अतः अचिन्त्य हो जाना चाहिये।
साधक को ”करने“ और ”होने“ से असंग हो जाने पर जो ”है“ उसमें अविचल आस्था हो जायेगी, श्रद्धा हो जायेगी।
वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति आदि का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है, इनकी ममता व कामना बनाये रखना सबसे भारी भूल है। इन्हीं से सम्बन्ध जोड़ने का अर्थ है-”है“ से विमुख होना।
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