Radha Swami ji 🙏🙏🥰22/02/26. Aaj ka satsang Baba Ji ne bhut acha farmaya hai 🙏
Автор: jeevan kumar
Загружено: 2026-02-22
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हरि की पूजा दुलम्भ है संतहु कहणा कछू न जाई" ।
वह कुल मालिक एक है, हमें सिर्फ उस एक की भक्ति करनी है। शरीर कभी भी मालिक नहीं हो सकता, मालिक सिर्फ शब्द रूप है क्योंकि यह जो शरीर है यह तो माया रूपी है। माया किसको कहते हैं? "आए जाए सो माया"। इसलिए इस शरीर की भक्ति में कभी नहीं लगना । माथा टेकना है तो सिर्फ एक के सामने टेकना है, और किसी के सामने नहीं। संतों ने यह शरीर धारण किया है सिर्फ रास्ता समझाने के लिए, प्रेरणा देने के लिए, उदाहरण बन कर आए हैं, न कि अपनी पूजा करवाने और माथे टिकवाने आए हैं।
बाणी में लिखा है... "शब्द गुरु सुरत धुन चेला" ।
इसलिए असली गुरु शब्द है और असली चेला सुरत ।
हमें अपना बर्तन साफ करना है। और करेगा भी वही, हमें तो सिर्फ़ उसके हुकुम, उसकी रज़ा और उसके भाणे में रहना है, बस । मन इतना हमारे नियंत्रण से बाहर है कि भक्ति की तरफ तो कभी लगने ही नहीं देता। यह हमारे ऊपर हावी हो चुका है, काबू में ही नहीं है। इसे बिगाड़ा आप लोगों ने ही है और अब ठीक भी आपको ही करना पड़ेगा और यह ठीक होगा तो सिर्फ़ भजन सिमरन से। और मालिक की खुशी हमें सिर्फ भजन और सिमरन से प्राप्त हो सकती है। असली काम भजन सिमरन है और हमें भजन सिमरन की तरफ ध्यान देना होगा । भजन सिमरन के बिना हमारा छुटकारा नहीं, मुक्ति सिर्फ़ भजन सिमरन से ही मिलेगी। 40 साल हुजूर हमें क्या समझाते रहे कि भजन सिमरन करो। क्या हम भजन सिमरन करते हैं ? नहीं करते । तो कैसे हुजूर की ख़ुशी प्राप्त कर सकते हैं ?एक ही मालिक और उसकी भक्ति पर बहुत ज़ोर दिया। ज़ात पात के बारे में भी बहुत समझाया कि पहले बाँट कर खाना और रहना सीखो । जानवर खाना खाते है जितनी ज़रूरत होती है, बाकी छोड़ देते हैं कि और कोई खा ले, लेकिन इंसान को पहले अपनी, फ़िर बच्चों की, फिर उनके बच्चों की चिंता रहती है। हम दूसरों की जात पूछते हैं लेकिन हवा ने तो कभी नहीं कहा कि पहले अपनी जात बताओ फ़िर हवा मिलेगी, पेड़ ने तो कभी नहीं हमसे हमारी जात पूछी, तो हम क्यों पूछते हैं ।
बाणी में आया है कि "एक पिता एकस के हम बारिक"...
फ़िर हम क्यों किसी की जात पूछते हैं और अपने आप को उस परमात्मा से दूर कर लेते हैं।
जो कुछ परमात्मा ने आपको दिया है उससे कभी संतुष्ट नहीं होते, बल्कि हमेशा मांगते ही रहते हैं। क्या परमात्मा को पता नहीं है कि हमें किस चीज़ की ज़रुरत है? क्या हमारा हाजमा है कि हम बर्दाश्त कर सकें ? वह तो बहुत देता आया है और आगे भी देगा लेकिन हमारा हाजमा ही नहीं है कि उसकी रहमत की कद्र कर सकें । उसकी रहमत की कद्र करना सीखो भाई, कद्र करो उसकी बक्शी हुई हर चीज़ की। हम दिन में कई बार खाते हैं जबकि हमें पता है कि दिन में कितनी calories हमें चाहिए। फ़िर हम क्यों नहीं एक ही बार में खा लेते । क्योंकि हमारा हाजमा नहीं है, हम हज़म नहीं कर सकते । ठीक इसी तरह उससे सब कुछ एक साथ मांगेगे, तो हम हज़म नहीं कर सकेंगे । जो कुछ उसने दिया है, पहले उसकी कद्र करना तो सीख जाओ ।
अगर हम यहां पर आए हैं तो क्यों आए हैं। किसी ने आप की हाजिरी तो नहीं लगानी। इतनी धुंद और सर्दी में घर से निकल कर के आए हो। कोई ना कोई दिल में चाहत थी तभी तो आए हो । 40 साल हुजूर ने हमें यहाँ से समझाया कि भाई, भजन सिमरन करो । क्या हम उस हुकुम पर चल रहे हैं? क्या कभी हमने उनके हुकुम को माना है ? उन्होंने तो कुछ नहीं मांगा। सिर्फ बैठ कर के भजन सिमरन करने को कहा है और उसको याद करना है, यही काम हमारे लिए मुश्किल बना हुआ है।
हम कहते हैं कि जी दया करो। जो कुछ भी मिलेगा, वह भजन सिमरन के ज़रिए ही मिलेगा और अगर भजन सिमरन नहीं करोगे, तो कोई फायदा नहीं। याद रखना, वह देने में कसर नहीं छोड़ेगा लेकिन हम बर्तन को तो साफ करें। बर्तन साफ नहीं है तो डालने वाला कैसे डालेगा ? बर्तन साफ़ करने की ज़िम्मेदारी हमारी है, बर्तन भरने की ज़िम्मेदारी उसकी है। वह अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करेगा, लेकिन पहले हमें अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करनी होगी। और साफ़ भी वही करेगा, लेकिन हम उसका हुकुम तो मानें, यानी बैठें तो सही, उसकी रज़ा और भाणे में रहने की कोशिश तो करें। यह दुनियावी ज़िम्मेदारियाँ भी हम क्या समझते हैं कि हम निभा रहे हैं या निभा सकेंगे ? भजन सिमरन के बिना और उसकी रहमत के बिना यह भी आप नहीं निभा सकते। अंतिम वक़्त सिर्फ़ भजन सिमरन ही सहाय होगा। इसलिए जो कुछ आपको दिया गया है उसकी कद्र करना सीखो ।संत महात्मा आपको सिर्फ प्रेरणा दे सकते हैं और माहौल बना सकते हैं, लेकिन भजन आपको खुद करना पड़ेगा। बड़े से बड़े संत के साथ आप क्यों न जुड़े हों, तो भी जब तक आप खुद नहीं करोगे, आपको कुछ नहीं मिलेगा। वह जितने भी पहुंचे हुए क्यों न हों, आपको उसका फायदा नहीं मिलने वाला। जैसे मेरे खाना खाने से आपकी भूख नहीं मिट सकती, इसी तरह से भजन सिमरन आपके लिए कोई और नहीं कर सकता। अगर ऐसा हो सकता होता तो भोजन भंडार और लंगर बंद कर देते हैं, और मैं अकेला घर में आराम से खाना खा लूं और आपका पेट भर जाय और आप सत्संग सुन कर चलते बनो, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता। इसी तरह से भजन सिमरन हर एक को करना होगा। ग्रन्थ साहिब की पूरी बाणी में एक ही हुकुम कहा गया है। क्या हम जानते हैं कि वह हुकुम क्या है ? "एको नाम हुकुम है नानक सतगुरु दिया बुझाए जियो..." कि नाम और शब्द की कमाई करो । क्या हम उस हुकुम की पालना कर रहे हैं ?
लेकिन हम तो मन में बुरे ख़याल, गंदे विचार, इर्ष्या, वैर विरोध और न जाने क्या क्या रखते हैं। शर्म नहीं आती हमको ? कि उस मालिक को याद करने की बजाय क्या कुछ सोचते और करते रहते हैं, सिर्फ़ भजन सिमरन नहीं करते ।
आखिर में बाबाजी ने फ़रमाया कि पांचवी पातशाही जी ने सभी वेदों और ग्रन्थ पोथियों का निचोड़ हमारे सामने पेश करते हुए फ़रमाया कि "सिमृति बेद पुराण पुकारनि पोथीआ ॥ नाम बिना सभि कूड्डु गाली होछीआ ॥ नामु निधानु अपारु भगता मनि वसै ॥ जनम मरण मोहु दुखु साधू संगि नसै ॥"
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