श्री दुर्गा अर्गला स्तोत्रम् | Sarva Badha Nivaran Powerful Stotra | Argala Stotra with Lyrics
Автор: Bhaktimay_India
Загружено: 2026-01-18
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जब भक्त अर्गला स्तोत्र का स्मरण करता है, तब स्वयं माँ दुर्गा उसकी रक्षा के लिए आगे आती हैं।” Chant Argala Stotra and awaken divine protection, courage, and inner strength.
The Argala Stotra is one of the most powerful hymns dedicated to Maa Durga, revealed in the Durga Saptashati.
The word “Argala” means key or bolt symbolizing that this sacred stotra acts as the divine key that unlocks the hidden powers and blessings of the Mother Goddess.
Chanting Argala Stotra is believed to:
Remove fear, negativity, and obstacles
Grant protection, courage, success, and victory
Strengthen faith, devotion, and inner power
Awaken the active grace of Maa Durga
This stotra is traditionally recited during Navratri, Chandi Path, and times of spiritual struggle, when devotees seek the direct intervention of Shakti in their lives.
Listen with devotion.
Chant with surrender.
Feel the divine armor of Maa Durga surrounding you.
श्री दुर्गा अर्गला स्तोत्रम् माँ दुर्गा की उपासना का एक अत्यंत प्रभावशाली और रहस्यमय स्तोत्र है।
“अर्गला” का अर्थ होता है कुंजी या ताला खोलने वाला द्वार और यह स्तोत्र भक्त के जीवन में रुकी हुई कृपा, शक्ति और सौभाग्य के द्वार खोलता है।
इस स्तोत्र के पाठ से
नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है
भय, रोग, शत्रु और बाधाएँ दूर होती हैं
आत्मबल, साहस और आध्यात्मिक शक्ति की प्राप्ति होती है
माँ दुर्गा की विशेष कृपा शीघ्र फलित होती है
नवरात्रि, अष्टमी, नवमी या प्रतिदिन श्रद्धा से श्रवण और जप करने से यह स्तोत्र जीवन में सुरक्षा, शांति और सिद्धि प्रदान करता है।
यह प्रस्तुति पूर्णतः भक्ति, शुद्ध उच्चारण और दिव्य भाव के साथ बनाई गई है ताकि श्रोता केवल सुने नहीं, बल्कि माँ दुर्गा की उपस्थिति को अनुभव कर सके।
“या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता…”
माँ आपकी हर अर्गला खोलें और आपको अभय प्रदान करें।
जय माता दी
Created by: Bhaktimay India
Chanted by: Nitika
Full Lyrics in Hindi:
ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः,
अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे
सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः॥
ॐ नमश्चण्डिकायै॥
मार्कण्डेय उवाच
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥1॥
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥2॥
मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥3॥
महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥4॥
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥5॥
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥6॥
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥7॥
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥8॥
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥9॥
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥10॥
चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥11॥
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥12॥
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥13॥
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥14॥
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥15॥
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥16॥
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥17॥
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥18॥
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥19॥
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥20॥
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥21॥
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥22॥
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥23॥
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥24॥
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशतीसङ्ख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥25॥
॥ इति देव्या अर्गलास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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