आनन्द लहरी स्तोत्र। श्री शंकराचार्य कृत आनन्द लहरी स्तोत्र।
Автор: Satkar tv
Загружено: 2020-09-23
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नमस्कार मित्रों आज की इस वीडियो में हम आपके लिए लेे के आए है श्री शंकराचार्य कृत "आनन्द लहरी स्तोत्र" यह स्तोत्र त्वरित फलदाई है आपको यह स्तोत्र नित्य पढ़ना और सुनना चाहिए।
🔴 आनंद लहरी स्तोत्र👇👇
भवानि स्तोतुं त्वां प्रभवति चतुर्भिनं वदनै:
प्रजानामीशानस्त्रिपुरमथन: पंचभिरपि।
न षड्भि: सेनानीर्दशशतमुखैरप्यहिपति-
स्तदान्येषां केषां कथय कथमस्मिन्नवसर:।।1।।
घृतक्षीरद्राक्षामधुमधुरिमा कैरपि पदै-
र्विशिष्यानाख्येयो भवति रसनामात्रविषय:।
तथा ते सौन्दर्य परमशिवदृड्मात्रविषय:
कथकांरं ब्रूम: सकलनिगमागोचरगुणे।।2।।
मुखे ते ताम्बूलं नयनयुगले कज्जलकला
ललाटे काश्मीरं विलसति गले मौक्तिकलता।
स्फुरत्कांची शाटी पृथुकटितटे हाटकमयी
भजामि त्वां गौरीं नगपतिकिशोरीमविरतम् ।।3।।
विराजन्मन्दारद्रुमकुसुमहारस्तनतटी
नदद्वीणानादश्रवणविलसत्कुण्डलगुणा।
नतांगी मातंगीरुचिरगतिभंगी भगवती
सती शम्भोरम्भोरुहचटुलचक्षुर्विजयते।।4।।
.नवीनार्कभ्राजन्मणिकनकभूषापरिकरै-
र्वृतांगी सारंगीरुचिरनयनांगीकृतशिवा।
तडित्पीता पीताम्बरललितमंजीरसुभगा
ममापर्णा पूर्णा निरवधिसुखैरस्तु सुमुखी।।5।।
हिमाद्रे: संभूता सुललितकरै: पल्लवयुता
सुपुष्पा मुक्ताभिर्भ्रमरकलिता चालकभरै:।
कृतस्थाणुस्थाना कुचफलनता सूक्तिसरसा
रुजां हन्त्री गन्त्री विलसति चिदानन्दलतिका।।6।।
सपर्णामाकीर्णां कतिपयगुणै: सादरमिह
श्रयन्त्यन्ये वल्लीं मम तु मतिरेवं विलसति।
अपर्णैका सेव्या जगति सकलैर्यत्परिवृत:
पुराणोSपि स्थाणु: फलति किल कैवल्यपदवीम्।।7।।
विधात्री धर्माणां त्वमसि सकलाम्नायजननी
त्वमर्थानां मूलं धनदनमनीयाड्घ्रिकमले।
त्वमादि: कामानां जननि कृतकन्दर्पविजये
सतां मुक्तेर्बीजं त्वमसि परमब्रह्ममहिषी।।8।।
प्रभूता भक्तिस्ते यदपि न ममालोलमनस-
स्त्वया तु श्रीमत्या सदयमवलोक्योSहमधुना।
पयोद: पानीयं दिशति मधुरं चातकमुखे
भृशं शंके कैर्वा विधिभिरनुनीता मम मति:।।9।।
कृपापांगालोकं वितर तरसा साधुचरिते
न ते युक्तोपेक्षा मयि शरणदीक्षामुपगते।
न चेदिष्टं दद्यादनुपदमहो कल्पलतिका
विशेष: सामान्यै: कथमितरवल्लीपरिकरै:।।10।।
महान्तं विश्वासं तव चरणपंकेरुहयुगे
निधायान्यन्नैवाश्रितमिह मया दैवतमुमे।
तथापि त्वच्चेतो यदि मयि न जायेत सदयं
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम्।।11।।
अय: स्पर्शे लग्नं सपदि लभते हेमपदवीं
यथा रथ्यापाथ: शुचि भवति गंगौघमिलितम्।
तथा तत्तत्पापैरतिमलिनमन्तर्मम यदि
त्वयि प्रेम्णासक्तं कथमिव न जायेत विमलम्।।12।।
त्वदन्यस्मादिच्छाविषयफललाभे न नियम-
स्त्वमर्थांनामिच्छाधिकमपि समर्थां वितरणे।
इति प्राहु: प्रांच: कमलभवनाद्यास्त्वयि मन-
स्त्वदाससक्तं नक्तं दिवमुचितमीशानि कुरु तत्।।13।।
स्फुरन्नानारत्नस्फटिकमयभित्तिप्रतिफल-
त्त्वदाकारं चंचच्छशधरकलासौधशिखरम्।
मुकुन्दब्रह्मेन्द्रप्रभृतिपरिवारं विजयते
तवागारं रम्यं त्रिभुवनमहाराजगृहिणि।।14।।
निवास: कैलासे विधिशतमखाद्या: स्तुतिकरा:
कुटुम्बं त्रैलोक्यं कृतकरपुट: सिद्धिनिकर:।
महेश: प्राणेशस्तदवनिधराधीशतनये
न ते सौभाग्यस्य क्वचिदपि मनागस्ति तुलना।।15।।
वृषो वृद्धो यानं विषमशनमाशा निवसनं
श्मशानं क्रीडाभूर्भुजगनिवहो भूषणविधि:।
समग्रा सामग्री जगति विदितैवं स्मररिपो-
र्यदेतस्यैश्वर्यं तव जननि सौभाग्यमहिमा।।16।।
अशेषब्रह्माण्डप्रलयविधिनैसर्गिकमति:
श्मशानेष्वासीन: कृतभसितलेप: पशुपति:।
दधौ कण्ठे हालाहलमखिलभूगोलकृपया
भवत्या: संगत्या: फलमिति च कल्याणि कलये।।17।।
त्वदीयं सौन्दर्यं निरतिशयमालोक्य परया
भियैवासीद्गंगा जलमयतनु: शैलतनये।
तदेतस्यास्तस्माद्वदनकमलं वीक्ष्य कृपया
प्रतिष्ठामातन्वन्निजशिरसिवासेन गिरिश:।।18।।
विशालश्रीखण्डद्रवमृगमदाकीर्णघुसृण-
प्रसूनव्यामिश्रं भगवति तवाभ्यंगसलिलम्।
समादाय स्रष्टा चलितपदपांसून्निजकरै:
समाधत्ते सृष्टिं विबुधपुरपंकेरुहदृशाम्।।19।।
वसन्ते सानन्दे कुसुमितलताभि: परिवृते
स्फुरन्नानापद्से सरसि कलहंसालिसुभगे।
सखीभि: खेलन्तीं मलयपवनान्दोलितजले
स्मरेद्यस्त्वांं तस्य ज्वरजनितपीडापसरति।।20।।
।।इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचिता आनन्दलहरी सम्पूर्णा।।
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