Part 2 - New Forest Land Lease Policy - Viability & Opportunities for WBIs
Автор: Ply Insight
Загружено: 2026-02-05
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वेबिनार में आईटीसी के पूर्व वाइस प्रेसिडेंट डॉ. एच. डी. कुलकर्णी ने मुख्य रूप से डिग्रेडेड फॉरेस्ट लैंड को निजी वृक्षारोपण के लिए लीज पर देने से जुड़े साढ़े तीन दशकों (3.5 decades) के संघर्ष और इतिहास पर प्रकाश डाला। उनके वक्तव्य के मुख्य बिंदु संक्षेप में नीचे दिए गए हैं:
• ऐतिहासिक बाधाएं: उन्होंने बताया कि यह बहस 1985 से चल रही थी, लेकिन दो मुख्य चिंताओं—खाद्य सुरक्षा (Food Production) पर प्रभाव और पारिस्थितिकी (Ecology) को खतरे—के कारण यह नीति सिरे नहीं चढ़ पा रही थी।
• अतीत के असफल प्रयास: कुलकर्णी जी ने जिक्र किया कि मैसूर पेपर मिल्स जैसे सरकारी उपक्रमों को तो जमीन मिली, लेकिन जब हरिहर पॉली फाइबर या आईटीसी (APFDC के साथ) जैसी निजी कंपनियों ने सहयोगात्मक वृक्षारोपण के प्रस्ताव रखे, तो उन्हें जन-आंदोलनों या सरकारी आपत्तियों के कारण खारिज कर दिया गया।
• आर्थिक चुनौतियां: 1995 और उसके बाद भी चर्चाएं हुईं, लेकिन नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV) की अत्यधिक लागत के कारण उद्योग जगत के लिए डिग्रेडेड लैंड पर वृक्षारोपण करना आर्थिक रूप से कठिन लगने लगा था।
• पायलट प्रोजेक्ट का सुझाव: उन्होंने वर्तमान नीति का स्वागत करते हुए सलाह दी कि उद्योगों को सीधे बड़े निवेश के बजाय 'पायलट प्रोजेक्ट्स' (Pilot Projects) से शुरुआत करनी चाहिए ताकि इसकी सफलता को साबित किया जा सके।
• सस्टेनेबल मॉडल पर जोर: उनका मानना है कि उद्योगों को केवल 'मोनोकल्चर' (एक ही तरह के पेड़) नहीं लगाना चाहिए, बल्कि प्राकृतिक रूट स्टॉक को पुनर्जीवित (Regenerate) करना चाहिए। उन्होंने आईटीसी द्वारा विकसित एक मॉडल का उदाहरण दिया जो जैव-विविधता और स्थिरता (Sustainability) के सिद्धांतों पर आधारित है।
कुलकर्णी जी ने अंत में कहा कि अब समय सही है क्योंकि वैश्विक स्तर पर सस्टेनेबिलिटी और कार्बन सिक्वेस्टेशन (Carbon Sequestration) जैसे लक्ष्यों के कारण एनजीओ और सरकार का नजरिया भी बदल रहा है
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