📍देवसागर मेला 2024 जाय हिंगलाज माता 🙏
Автор: CG EXPLORER 0.3
Загружено: 2024-05-08
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आदि शक्ति माता हिंगलाज जेवरादाई देवसागर भटगांव | Hinglaj mata Mandir Devsagar Bhatgaon Sarangarh-Bilaigarh
देवसागर मेला :-
जय जोहार संगवारी मैं आज आपको लेकर चलूंगा मैं सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिला के भटगांव के पास देवसागर नामक गांव में जहां पर है मां हिंगलाज माता मंदिर जो कि बहुत ही रहस्यों से भरा हुआ है नगर भटगांव से महज तीन किलो मीटर में दक्षिण दिशा की ओर ऐतिहासिक मंदिर पठारों से घिरा हुआ है। जहां आदि शक्ति माता हिंगलाज जेवरादाई विराजमान है। यहां प्रचीन काल से चैत्र पूर्णिमा हनुमान जंयती के दिन एक दिवसीय भव्य मेला का आयोजन किया जाता है। यहां कि मान्यता यह है कि लोगों की हर मन्नात पूरी होती है। और लोग लाखों की संख्या में दर्शन करने आते हैं। वहीं रात में एक भी व्यक्ति मंदिर के पास नहीं रुकते हैं। बताया जाता है कि माता उस रात पूरे मंदिर क्षेत्र में भ्रमण करती हैं। अगर कोई व्यक्ति देख लेते है तो उसकी मृत्यु हो जाती है। इस ऐतिहासिक मंदिर का रहस्य भटगांव जमींदार व सारंगढ़ के राजघराने से जुड़ी हुई है। वहीं पुराने जमाने के बुजुर्गों द्वारा बताया जाता है कि प्राचीन काल से देवी हिंगलाज भटगांव नगर पंचायत से तीन किमी दूर ग्राम जेवराडीह गांव की पहाड़ी पर स्थित है। बताया जाता है कि सारंगढ़ का राजा देवी की मूर्ति को रात्रि में बैलगाड़ी से अपने राज्य ला रहा था ठीक उसी रात भटगांव के जमींदार को सपना में दिखाई दिया कि मुझे सारंगढ़ का राजा जबरदस्ती उठाकर बैलगाड़ी में अपने राज्य ले जा रहा है। तब जमींदार उसी रात क्षेत्र के कुछ ग्रामीणों को लेकर देवसागर पहुंचा। जहां राजा माता हिंगलाज देवी की मूर्ति को अपने बैलगाड़ी में लेकर जा रहा था। तब जमींदार के कहने पर राजा देवी की मूर्ति वापस छोड़कर वापस अपने राज्य सारंगढ़ चले गए किन्तु पुराने बुजुर्गों द्वारा वापस छोड़कर वापस अपने राज्य सारंगढ़ चले गए किन्तु पुराने बुजुर्गों द्वारा बताया कि सारंगढ़ राजा व भटगांव जमींदार के बीच देवी मूर्ति को ले जाने के चलते काफी विवाद हुआ। इस दौरान राजा देवी के नाक का कुछ हिस्सा नथनी सहित काट कर ले गया। आज भी चैत्र पूर्णिमा के दिन सारंगढ़ राजमहल में देवी की पूजा अर्चना होती है। ठीक इसी दिन चैत्र पूर्णिमा के दिन ग्राम देवसागर में भटगांव जमींदार स्व. धरम सिंग ने मूर्ति की स्थापना ग्राम देवसागर की पहाड़ियों के ऊपर की। इसलिए इसी दिन से चैतराई मेले का शुरुआत हुई। मेले का आयोजन प्रति वर्ष चैत पूर्णिमा के दिन से आज तक भटगांव जमींदार परिवार द्वारा किया जाता है। जमीदार परिवार के परिवार देवी की पूजा अर्चना चार पीढ़ी से करते आ रहे हैं। अंतिम जमीदार प्रेम भुवन प्रताप सिंह थे। उनकी वंशज प्रभादेवी, इंदिरा कुमारी द्वारा लगभग 50 वर्षों तक देवी की पूजा-अर्चना की गई।
रात 9 बजे के बाद मेला स्थल पर नहीं ठहरते लोग
यह बात देवसागर मंदिर के बारे में चर्चित है कि आज भी मेला के दिन रात्रि नौ बजे के बाद कोई भी आदमी मेला परिसर में नहीं ठहरता है क्योंकि देवी का वाहन शेर आता है और बलि दिया हुआ बकरे का खून चाट कर पूरा साफ कर देता है। इस तरह माता हिंगलाज की गाथा महिमा सुनने में आती है। माता के दर्शन के लिए बिहार, ओडिसा, मध्यप्रदेश तक के श्रद्धालु आते है। यह मंदिर एक किमी से पठार से घिरा हुआ है। एक भी वृक्ष नहीं है। गर्मी के माह में तपती धूप होने के बाद भी पठार के पत्थर से पांव नहीं जलते हैं।
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