बिंद में सिंध समाया / Bind Me Sind Samaya / Kirantan Prakaran- 2 / Vani
Автор: Spiritual Journey Nijanand
Загружено: 2026-01-21
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बिंद में सिंध समाया रे साधो, बिंद में सिंध समाया।
त्रिगुण स्वरूप खोजत भए विस्मय, पर अलख न जाइ लखाया॥
वेद अगम केहे उलटे पीछे, नेत नेत कर गाया।
खबर न परी बिंद उपज्या कहां थे, तांथे नाम निगम धराया॥
असत मंडल में सब कोई भूल्या, पर अखंड किने न बताया।
नींद का खेल खेलत सब नींद में, जाग के किने न देखाया॥
बिंद में सिंध समाया रे साधो, बिंद में सिंध समाया
देत दिखाई बाहर भीतर, ना भीतर बाहर भी नाहीं।
गुरु प्रसादे अंतर पेख्या, सो सोभा बरनी न जाई॥
सतगुरु सोई मिले जब सांचा, तब सिंध बिंद परचावे।
प्रगट प्रकाश करे पार ब्रह्म सो, तब बिंद अनेक उड़ावे॥
महामत कहे बिंद बैठे ही उड़या, पाया सागर सुख सिंध।
अछरातीत अखंड घर पाया, ए निधि पूरब सनबंध॥
किरंतन प्रकरण- 2
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