सूखता जंगल और एक बच्चे का साहस | मोगली की अनसुनी कहानी| पानी का महत्व |मोगली और प्रकृति की दोस्ती |
Автор: ira toonghar
Загружено: 2026-01-07
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कहानी: मोगली और सूखता जंगल
घने जंगल में सुबह की धूप पत्तों के बीच से छनकर ज़मीन पर उतर रही थी। हवा में मिट्टी की सौंधी खुशबू थी, लेकिन फिर भी कुछ कमी-सी महसूस हो रही थी। मोगली एक ऊँचे पेड़ की डाल पर बैठा दूर तक देख रहा था। जहाँ कभी नदी चमकती हुई बहती थी, वहाँ अब पत्थर और सूखी रेत दिखाई दे रही थी।
मोगली नीचे कूदा और नदी किनारे पहुँचा। उसने पानी में हाथ डाला, लेकिन वह ठंडक नहीं मिली जो हमेशा मिलती थी। उसका दिल बेचैन हो उठा। वह दौड़ता हुआ बघीरा के पास गया, जो चुपचाप चट्टान पर बैठा जंगल को देख रहा था।
“नदी हर दिन छोटी क्यों हो रही है?” मोगली ने पूछा।
बघीरा ने गहरी साँस ली और बोला, “पहाड़ियों में इंसानों ने पानी का रास्ता बदल दिया है। जो पानी जंगल तक आता था, अब वहीं नहीं पहुँच रहा।”
मोगली को ग़ुस्सा आ गया। “जंगल ने उनका क्या बिगाड़ा है?”
बघीरा शांत आवाज़ में बोला, “जो सिर्फ़ अपनी ज़रूरत देखता है, वह दूसरों का भरोसा भूल जाता है।”
मोगली ने तय किया कि वह खुद इंसानों से बात करेगा। वह जंगल की सीमा पार कर बस्ती पहुँचा। वहाँ लोग खेतों में काम कर रहे थे, नहरें बनी हुई थीं और पानी तेज़ी से बह रहा था। मोगली ने सबको समझाने की कोशिश की कि अगर जंगल सूख गया तो सबका नुकसान होगा, लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी। कुछ ने हँस दिया, कुछ ने उसे भगा दिया।
मोगली चुपचाप लौट आया। जंगल में हालात और बिगड़ने लगे। तालाब सूखने लगे, हिरण कमज़ोर हो गए और पक्षी दूर-दूर उड़ने लगे। एक रात भेड़ियों के झुंड में हलचल मच गई। एक छोटा भेड़िया पानी की कमी से बीमार पड़ गया। मोगली ने उसे गोद में उठाया और उस पल उसे समझ आ गया कि सिर्फ़ ग़ुस्सा किसी काम का नहीं।
अगली सुबह मोगली ने सभी जानवरों को एक बड़े पेड़ के नीचे इकट्ठा किया। उसने कहा कि अब लड़ाई नहीं होगी, बल्कि मिलकर रास्ता ढूँढा जाएगा। हाथियों से उसने ज़मीन के नीचे पानी के पुराने रास्ते खोजने को कहा। बंदरों से ऊँचाई से जंगल देखने को कहा और हिरणों से गीली मिट्टी पहचानने को कहा।
कई दिनों तक सबने मेहनत की। थकान थी, लेकिन उम्मीद भी थी। एक शाम हाथियों ने चिंघाड़ कर सबको बुलाया। चट्टानों के बीच एक पुराना जलमार्ग मिला, जो कभी नदी को जंगल तक लाता था। सब जानवरों ने मिलकर पत्थर हटाए और मिट्टी साफ़ की। थोड़ी देर बाद पानी की एक पतली धार बहने लगी।
जैसे ही पानी जंगल में पहुँचा, मोगली की आँखें भर आईं। धीरे-धीरे तालाब भरने लगे, पेड़ हरे होने लगे और जानवरों में जान लौट आई।
कुछ दिन बाद इंसान फिर आए। उन्होंने देखा कि जंगल फिर से ज़िंदा हो रहा है। मोगली उनके सामने आया, इस बार बिना ग़ुस्से के। उसने बस इतना कहा, “पानी बाँटने से कम नहीं होता।”
लोग चुप हो गए। एक बुज़ुर्ग आगे बढ़ा और बोला, “अगर जंगल बचेगा, तो हमारा भविष्य भी बचेगा।” उन्होंने नहर का रास्ता बदला और नदी का कुछ पानी फिर जंगल की ओर आने लगा।
शाम को बघीरा मोगली के पास आया और बोला, “आज तुमने ताक़त से नहीं, समझ से जीत हासिल की है।”
मोगली मुस्कराया। अब वह सिर्फ़ जंगल में रहने वाला बच्चा नहीं था, बल्कि जंगल और इंसानों के बीच एक ऐसा भरोसा बन चुका था, जिसने दोनों को जोड़ दिया था।
सीख:
समस्या का हल लड़ाई या ग़ुस्से में नहीं, बल्कि समझदारी, सहयोग और संतुलन बनाए रखने में होता है।
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