120 Bahadur Full Movie Review / Faran Akhtar and all Team
Автор: Akgreview23
Загружено: 2025-11-21
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Описание:
निश्चित रूप से। रेज़ांग ला की लड़ाई (Battle of Rezang La) भारतीय सेना के इतिहास में एक अविश्वसनीय वीरता और सर्वोच्च बलिदान की गाथा है।
यहाँ उस ऐतिहासिक युद्ध की कहानी हिंदी में दी गई है:
🇮🇳 रेज़ांग ला की लड़ाई: 18 नवंबर 1962
🏔️ पृष्ठभूमि और स्थान
समय: 18 नवंबर 1962, भारत-चीन युद्ध के दौरान।
स्थान: रेज़ांग ला, लद्दाख के चुशूल सेक्टर में 16,000 फीट से अधिक की ऊँचाई पर स्थित एक बर्फीला दर्रा।
महत्व: यह दर्रा अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि इसे पार करने के बाद चीनी सेना के लिए चुशूल हवाई पट्टी और लद्दाख के द्वार खुल जाते।
रक्षक दल: भारतीय सेना की 13 कुमाऊं बटालियन की 'C' कंपनी, जिसमें सिर्फ 120 सैनिक थे। ये सभी सैनिक मुख्य रूप से हरियाणा के रेवाड़ी और आसपास के अहीर (यादव) जवान थे।
कमांडिंग ऑफिसर: मेजर शैतान सिंह (जिन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया)।
⏳ विपरीत परिस्थितियाँ
रेज़ांग ला में सैनिकों को एक बड़ी समस्या का सामना करना पड़ा: इस चौकी तक भारतीय सेना की मुख्य तोपखाने (Artillery) की सहायता नहीं पहुँच सकती थी। भौगोलिक स्थिति के कारण तोपें यहाँ के लक्ष्यों को भेद नहीं सकती थीं। इसलिए, 120 सैनिकों को बिना किसी बाहरी भारी गोलाबारी समर्थन के, अकेले ही लड़ना था।
⚔️ भीषण संघर्ष
18 नवंबर की सुबह, भयानक ठंड (तापमान -30^\circ \text{C} से नीचे) में, चीनी सेना ने हमला शुरू कर दिया।
बड़ा हमला: अनुमान है कि चीनी सेना की संख्या 3,000 से 5,000 के बीच थी, और वे भारी मोर्टार और तोपखाने से लैस थे। भारतीय सैनिक कम से कम 25 गुना अधिक संख्या में थे।
दृढ़ निश्चय: भारतीय सैनिकों ने दुश्मन को अपनी 100 गज की रेंज में आने तक इंतजार किया और फिर सटीक, एक साथ फायरिंग करके चीनी सैनिकों को भारी क्षति पहुँचाई।
मेजर शैतान सिंह की प्रेरणा: मेजर शैतान सिंह घायल होने के बावजूद, लगातार एक प्लाटून से दूसरी प्लाटून तक जाकर सैनिकों का हौसला बढ़ा रहे थे, गोला-बारूद बाँट रहे थे और मोर्चाबंदी को मजबूत कर रहे थे।
अंतिम लड़ाई: जब मेजर शैतान सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए, तो उन्होंने अपने साथियों को उन्हें छोड़कर जाने का आदेश दिया, ताकि वे सुरक्षित रहें और लड़ाई जारी रख सकें। कुछ समय बाद चट्टान के पीछे उनकी मृत्यु हो गई।
बलिदान: जब गोला-बारूद खत्म हो गया, तो 13 कुमाऊं के अहीर जवानों ने हथियार नहीं डाले। उन्होंने अपनी संगीनें (Bayonets) निकालीं और 'जय यादव! जय माधव!' का नारा लगाते हुए चीनी सैनिकों पर आमने-सामने का हमला (Hand-to-hand combat) बोल दिया। उन्होंने 'अंतिम आदमी और अंतिम गोली' तक लड़ाई लड़ी।
🌟 विरासत
बलिदान: 120 जवानों में से 114 जवान शहीद हुए। केवल छह सैनिक गंभीर रूप से घायल होकर या बंदी बनाकर जीवित बचे।
दुश्मन का नुकसान: भारतीय सैनिकों ने अपनी छोटी संख्या के बावजूद चीनी सेना को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया। भारतीय रिकॉर्ड के अनुसार, इस एक लड़ाई में चीनी सेना के 1300 से अधिक सैनिक मारे गए।
शहीदों का सम्मान: महीनों बाद, जब युद्ध क्षेत्र का दौरा किया गया, तो शहीद जवानों के जमे हुए शव अपनी-अपनी खाइयों में उसी स्थिति में मिले, जैसे वे लड़ रहे थे – बंदूक पकड़े हुए, दुश्मन की दिशा में मुंह किए हुए।
रणनीतिक जीत: रेज़ांग ला के इस ऐतिहासिक प्रतिरोध ने चीनी सेना की गति को पूरी तरह रोक दिया और चुशूल क्षेत्र को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
रेज़ांग ला की लड़ाई भारतीय सेना की बहादुरी और अटूट संकल्प की एक अमर कहानी है।
क्या आप इस लड़ाई में अन्य वीर चक्र विजेताओं के बारे में या रेज़ांग ला स्मारक के बारे में जानना चाहेंगे?
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