“तराज़ू का गुनाह – जब दिखावे की रोटी बेनकाब हुई”
Автор: Ik Islamic Story
Загружено: 2026-01-20
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यह कहानी एक ऐसे ताजिर की है जो इबादत, सदके और मीठी ज़ुबान के पीछे अपने गुनाह छुपाए बैठा था। हाजी करीम बख्त का बाज़ार में बड़ा नाम था, मगर उसकी तराज़ू, गज और खातों में इंसाफ़ नहीं था। वह तलवार से नहीं, तराज़ू से लोगों का हक़ मारता था।
कहानी उस मोड़ पर पहुंचती है जब एक सादा-सा मुसाफ़िर बाज़ार में आता है और उसके छोटे से सवाल पूरे शहर के झूठ को नंगा कर देते हैं। यह सिर्फ़ एक ठग की कहानी नहीं, बल्कि उस नफ़्स की तस्वीर है जो इबादत को दिखावा और तिजारत को ज़ुल्म बना देता है।
यह दास्तान याद दिलाती है कि रिज़्क़ हाथ की चालाकी से नहीं, दिल की सफ़ाई से बढ़ता है—और जब हिसाब खुलता है तो तराज़ू ही इंसान का सबसे बड़ा गवाह बन जाता है।
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