श्री शिव ताण्डव स्तोत्रम् स्वर डा0प्रदीप सेमवाल मुख्यपुजारी माता अनसूया
Автор: Dr Pradeep Semwal
Загружено: 2021-07-25
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#शिव# #तांडव# #स्तोत्र# का महत्व ओर फिर संस्कृत मे स्तोत्र।।
#Shiv# #Tandav# #Stotram#
अत्यंत प्रभावशाली शिव स्तोत्र है, जिसके नित्य पाठ से भगवान शिव की भक्ति और उनकी कृपा प्राप्त होती है। इस तांडव स्तोत्र की रचना लंकापति रावण के द्वारा की गयी थी।
रावण परम विद्वान और महान शिवभक्त था। उसने भगवान शिव को अपनी कठोर तपस्या से प्रसन्न करके बहुत सारे वरदान प्राप्त किये थे।
एक बार रावण अपनी शक्ति के मद में चूर होकर और भगवान के समक्ष अपनी भक्ति के प्रदर्शन के उद्देश्य से कैलाश पर्वत को अपनी भुजाओं में उठा लिया।
अन्तर्यामी भगवान शिव रावण के मनोभाव को समझकर उसके अहंकार के नाश के लिए कैलाश पर्वत का भार बढ़ाने लगे जिसे रावण सहन नहीं कर सका।
तब उसे अपनी गलती का आभाष हुआ और उसने धैर्य का परिचय देते हुए क्षणमात्र में ही शिव तांडव स्तोत्र #Shiv Tandav Stotram# रचकर भगवान शिव को गाकर सुनाया।
जिसे सुनकर भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए और रावण को #मनोवांछित# #वर# प्रदान किया।
जो मनुष्य शिवतांडव स्तोत्र द्वारा भगवान शिव की स्तुति करता है, उससे भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। नियमित रूप से शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से कभी भी #धन-सम्पति# की कमी नहीं होती है।
शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से साधक को साथ ही उत्कृष्ट #व्यक्तित्व# की प्राप्ति होती है।
यह पाठ करने से व्यक्ति का चेहरा तेजमय होता है, आत्मबल मजबूत होता है।
शिवतांडव स्तोत्र का पाठ करने से मन की कामना पूर्ण हो जाती है।
माना जाता है कि प्रतिदिन शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से #वाणी की सिद्धि# भी प्राप्त की जा सकती है।
भगवान #शिव नृत्य#, #चित्रकला#, #लेखन#, #योग#, #ध्यान#, समाधी आदि सिद्धियों को प्रदान करने वाले हैं, इसलिए शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से इन सभी विषयों में सफलता प्राप्त होती है।
शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से शनि दोष को कुप्रभावों से भी #छुटकारा# मिलता है।
जिन लोगों की कुण्डली में #सर्प योग#, #कालसर्प# #योग# या #पितृ दोष# लगा हुआ हो। उन्हें भी शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
शिव तांडव स्तोत्र की विधि-
शिव तांडव स्तोत्र का पाठ प्रातः काल या प्रदोष काल करना चाहिए।
सबसे पहले स्नानादि करने के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
शिव जी को प्रणाम करें और धूप, दीप और नैवेद्य से उनका पूजन करें।
रावण ने पीड़ा के कारण इस स्तोत्र को बहुत तेज स्वर में गाया था। इसलिए गाकर शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करें।
नृत्य के साथ इसका पाठ करना सर्वोत्तम माना जाता है। परंतु तांडव नृत्य केवल पुरूषों को ही करना चाहिए।
पाठ पूर्ण हो जाने के पश्चात भगवान शिव का ध्यान करें।
यह पाठ बहुत ऊर्जावान और शक्तिशाली माना गया है। परंतु यह पाठ करते समय किसी के प्रति अपने मन में दुर्भावना न रखें।
#श्री शिव ताण्डव स्तोत्र#
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥1॥
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनी ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥2॥
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥
जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥
सहस्त्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥5॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः ॥6॥
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥7॥
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥8॥
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥9॥
अखर्वसर्वमंगलाकलाकदम्बमञ्जरी-
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥10॥
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदंगतुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥11॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकस्त्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥12॥
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥13॥
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन् स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम् ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिन्तनम् ॥14 ॥
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥15 ॥
अर्थ – सायंकाल में पूजा समाप्त होने पर जो रावण के द्वारा गाये हुए इस शिव तांडव स्तोत्र ( Shiv Tandav Stotram ) का पाठ करता है, भगवान शंकर उस मनुष्य को वाहन रथ, हाथी, घोड़ों से युक्त सदा स्थिर रहने वाली संपत्ति प्रदान करते हैं।
|| शिव तांडव स्तोत्र समाप्त ||
स्वर-#डा0प्रदीप# #सेमवाल#
मुख्यपुजारी पुत्रवरदायिनी माता अनसूया देवी मण्डल
9411155233
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