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'मां' से 'मैं' तक- दब्बू होने और दबंग होने का विस्तार by रिसपाल सिंह विकल | JLS | जनवादी लेखक संघ |

Автор: Janwadi Lekhak Sangh

Загружено: 2026-03-16

Просмотров: 9

Описание: विरुंग्ला केंद्र, मीरा रोड़ के एक आयोजन ("युद्ध के विरुद्ध कविता") रिसपाल सिंह विकल जी ने अपने जन्मदिन, 14 मार्च को अपनी मां को समर्पित की और 15 मार्च को पुनः समर्पित की युद्ध से त्रस्त बड़ी मां को (मानवता को)

'मां' से 'मैं' तक- दब्बू होने और दबंग होने का विस्तार

मां कहती थी
हनते को हनिए
पाप दोष मत गिनिये

मां यह कहती तो रही
मगर
अपना हनन सहती भी रही
अनेक अनेक तरह से

मैने कभी नहीं देखा उसे
किसी हनते का हनन करते हुए

मुझे याद है कई बार का
पिता द्वारा उसका बेवजह पिटना
मुंह खुलने पर कभी कभी
लहू लुहान तक होना
प्रतिक्रिया में रो रोकर
बस इतना भर कहना
"हनते को हनिए
पाप दोष मत गिनिये"

वह पिटती रही बात बात पर
और मिटती रही हर घात पर

उसका यह पिटना और मिटना
जारी रहा
उसके विधवा हो जाने के बाद भी

वह अब पिटती थी
लाठी डंडे से नहीं
बेटे, बेटियों, बहुओं के
शब्द रूपी ढेलों से
घायल होती थी
बेआस, आस पड़ोस की
पैनी नज़रों के चाकुओं से
तब भी मैने मां को
किसी को हनते नहीं देखा
हां! रात को सोने से पहले
पीड़ा में टेर सी ज़रूर लगाती
"हनते को हनिए
पाप दोष मत गिनिये"

मां कथा सी सुनाती
श्री कृष्ण ने मात्र
सौ अपराध ही छमा किए थे शिशुपाल के
एक सौ एक पर
उठ गया था सुदर्शन

पर मां ने स्वयं क्यों सहा
अपराध पर अपराध
घर में भी, बाहर भी
क्यों नहीं किया पलटवार
एक भी बार
क्या यह मां की किसी
संचित चेतना के कारण
या किसी भय से

मां कहती थी
तुलसी ने ये कहा
कबीर ने वो कहा
राम यह कहते थे
और श्याम वह कहते थे

मां यूं ही सहती-कहती रही,
हम भी यूं ही देखते-सुनते रहे

पर अब मां...
कुछ नहीं कहती
वह मेरी सस्वर ....
अब नश्वर हो गई है
उसकी जगह अब
कुछ कुछ कहने लगा है
एक नवजात आक्रोष
मेरे भीतर से
शायद वह वही कहता है
जो मां कभी नहीं कह पाई
वह यह भी कहने लगा है कि
दब्बू सिर्फ कहता है
कहता ही रहता है
मगर करता नहीं कोई हरकत
अपने हनन के विरोध में

मैं सोचता हूं
क्या मां ऐसी ही थी
और क्या मैं भी हूं ऐसा

मैं चीखता हूं कभी कभी एकांत में
और कहता हूं मां से
जो है भी और
नहीं भी, मेरे सामने
मां मुझे मुक्ति चाहिए
तुम्हारे इस संस्कार से

इससे मुक्त होने को मैं
कितना बेचैन हूं
मां तुम नहीं जानती
जानती हैं पूजा के मंदिर में रखीं
तुम्हारी मूर्तियां, घंटी, माला
और वहीं
मेरे द्वारा सजाई तुम्हारी हुकिया

वार पर वार सहता हूं आतातायी का
गुस्सा नसों में दौड़ता तो है
मगर अनायास
झनझनाती हथेली, उंगलियों समेत
मुट्ठी बन घनघनाती नहीं
सुरक्षित सा महसूस करता हूं
उसे जांघों से सटाए रखने पर
पीने लगता हूं उन पलों को
खून के घूंट सा
और फिर
काल्पनिक पलटवार की योजना के साथ
उसे ठंडा कर लेता हूं
दुश्मन के अगले वार के लिये
स्थगित हो जाता है हर बार यूं ही
कर्तव्य का अपभ्रंश, एक करतब
पता नहीं मां का भी था क्या
ऐसा ही मानसिक द्वंद्व

जो भी हो मां
मैं हिंसा पर हिंसा सहकर
आत्म हंता सा
अहिंसक कहलाना नहीं चाहता

मां तुम्हारे महा मौन के बाद
मैने सुना
किताबों में उपेक्षित से बैठे
और फुसफुसाते
बुद्ध को, विवेकानंद को
मार्क्स को, गांधी को
पर नहीं हुआ ज़्यादा इज़ाफ़ा
बस इतना भर कि
जान सका यह बात
जो न जानी थी तुमसे कि
हम हैं जिस वर्ग से
वहां ऐसे ही हैं लगभग सभी
और हां! अब
घर, समाज, देश
और दुनियां
दूर तक देखने लगा हूं
इस दब्बू होने और दबंग होने के विस्तार को

हां मां याद आया
तुम गाती थीं एक लोक गीत भी अक्सर
"क्यों मारे जर्मन ने लाल रो रहीं महतारी"
ऐसा ही कुछ
विश्व युद्ध के विरुद्ध
न जाने किस मां का गीत
तुम्हारा हो गया था
जबकि तुम्हारा नहीं था
कोई भी लाल युद्ध में

मां कहती थी
विभाजन के समय
वो जो मार दिया गया था
और वो जो बिछुड़ गया था
हमेशा के लिए
कितने अपने थे दोनों ही

अब समझ आया कुछ-कुछ
अपनी मांटी में सनी मेरी मां
सिर्फ़ घर और गृहस्थी ही नहीं थी
देश और दुनियां की बयार को भी
भर लेती थी अपनी गीली छाती में

मुझे लगता है
मेरी मां की तरह
राष्ट्रीय आव्हानों के बावजूद
किसी भी मां ने, सच में,
चाहे वो कुंती हो या गांधारी
मरियम हो या यशोदा
हुलसी हो या नीमा
या फिर गोर्की के रचनात्मक युवक
पावेल की मदर
सभी ने
बेशक अपनी संतानों को
अन्याय न सहना तो सिखाया होगा
मगर युद्ध करना नहीं
विद्रोह और युद्ध के
बीच क्या कुछ था जो
दिखता था मात्र ममता को
पुरुषत्व को नहीं

तभी तो
धृतराष्ट्र रूपी
अंधी राजनीति से उपजती रही है
युद्ध की हिंसा
और
अहिंसा की स्वतः विस्तारित सीमाओं को उधेड़ देती है
घृणा, स्वार्थ और शोषण के अस्त्र शास्त्रों से

क्षमा करना।
अगर अशास्त्रीय ढंग कहूं
तो मेरी मां का आंचल
छाती से टपकते
मानवता के दूध से तो सदैव
भीगा रहता था
पर तुम्हारे तथाकथित राष्ट्रवाद का पोषण कभी नहीं किया उसने
देश भक्ति भी मुझे मां नहीं
देश ने सिखाई
भर भर कर सिखाई

पता नहीं अकाल ग्रस्त
कठोर धरती सी मां को
मैं अपने पूरे जीवन में
समझ पाऊंगा या नहीं
पर इतना समझना काफ़ी है
मां युद्ध को खारिज करती थी
जो कि अभी तक नहीं हुए हैं
होंगे भी नहीं तब तक
दंभी लिंगधारी फ्रेडरिक वॉन जैसे लोग
कहते रहेंगे
"वार इज ए बायोलॉजिकल नैसेसिटी"
अगर खारिज करना ही है
तो विश्व की सभी मांओं को
चीखना होगा एक स्वर में
"युद्ध जीवन की शर्त नहीं
जीवन के अंत की घोषणा है"

यह आयोजन 'जनवादी लेखक संघ' और 'स्वर संगम फाउंडेशन" के संयुक्त तत्वाधान में हुआ। "जन संस्कृति मंच" ने भी यहां नितिन और विनीता वर्मा द्वारा निर्मित युद्ध के विरुद्ध खड़ीं धारदार कविताओं की एक पोस्टर प्रदर्शनी लगाई।
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